BIHAR NEWS. पत्नी को किसी दूसरे पुरुष के साथ कथित तौर पर आपत्तिजनक स्थिति में देख लेना मात्र व्यभिचार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। पटना हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को आपत्तिजनक स्थिति में देखना और उसके साथ यौन संबंध होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। व्यभिचार का आरोप साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी हैं।

यह फैसला Miscellaneous Appeal No. 445 of 2024 में 3 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति बिबेक चौधरी और न्यायमूर्ति राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने पति की तलाक संबंधी अपील खारिज करते हुए मधुबनी परिवार न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी के खिलाफ व्यभिचार और क्रूरता के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलने पर तलाक देने से इनकार किया गया था।

क्या था पूरा मामला?
मामले में दंपति की शादी 2 जुलाई 2006 को हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। करीब चार साल बाद उनके एक बेटे का जन्म हुआ। बाद में दोनों के बीच वैवाहिक विवाद शुरू हो गया और मामला अदालत तक पहुंच गया।पति का आरोप था कि वर्ष 2013 में उसने अपनी पत्नी को अपनी बड़ी बहन के पति यानी जीजा के साथ कथित आपत्तिजनक स्थिति में देखा था। इसके बाद उसने पत्नी पर दूसरे पुरुष के साथ अवैध संबंध होने का आरोप लगाया। इसी आधार पर पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i) के तहत व्यभिचार और धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता को आधार बनाकर तलाक की मांग की। पति के मुताबिक, घटना के बाद पत्नी अपने मायके चली गई और 30 मार्च 2013 को वैवाहिक घर छोड़ दिया।

कोर्ट ने क्यों नहीं माना व्यभिचार साबित?
पटना हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पत्नी को किसी पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि दोनों के बीच यौन संबंध थे। अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि कथित घटना के बाद पति ने पत्नी या संबंधित व्यक्ति के खिलाफ पुलिस में कोई शिकायत या सनहा दर्ज नहीं कराया था।इसके अलावा उसने तत्काल अपने वैवाहिक रिश्तेदारों के सामने भी इस घटना की शिकायत नहीं की। कोर्ट ने यह भी पाया कि पति के माता-पिता या अन्य रिश्तेदारों की ओर से उसके आरोपों की पुष्टि करने वाला कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया।

सिर्फ शक के आधार पर नहीं लगेगा व्यभिचार का आरोप
हाईकोर्ट ने 1985 के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के Hargovind Soni v. Ramdulari मामले का भी हवाला दिया। अदालत ने माना कि व्यभिचार जैसे आरोपों में प्रत्यक्ष प्रमाण मिलना हमेशा आसान नहीं होता, इसलिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालांकि, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी और विश्वसनीय कड़ी होना जरूरी है। ऐसी परिस्थितियां होनी चाहिए, जो आरोप को मजबूती से साबित करें। महज संभावना, शक या पति का अकेला बयान पर्याप्त नहीं माना जा सकता। कोर्ट के मुताबिक, इस मामले में पति यह साबित नहीं कर सका कि उसकी पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ वास्तव में यौन संबंध थे। इसलिए व्यभिचार का आरोप कानूनी रूप से साबित नहीं हुआ।
पत्नी ने भी पति पर लगाए थे गंभीर आरोप
मामले में पत्नी की ओर से भी पति पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। पत्नी ने आरोप लगाया था कि पति ने उसे जहर देकर नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। हालांकि, अदालत ने इन आरोपों को भी महज आरोप के आधार पर स्वीकार नहीं किया और साक्ष्यों की आवश्यकता पर जोर दिया। कोर्ट ने साफ किया कि वैवाहिक विवाद में पति या पत्नी, किसी भी पक्ष की ओर से लगाया गया आरोप तब तक कानूनी रूप से सिद्ध नहीं माना जा सकता, जब तक उसके समर्थन में विश्वसनीय प्रमाण मौजूद न हों। इस फैसले के साथ पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि तलाक के लिए व्यभिचार का आरोप लगाने भर से बात साबित नहीं होती, बल्कि उसे विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए स्थापित करना जरूरी है।





































