BILASPUR NEWS. निजी आवास में आयोजित प्रार्थना सभाओं को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि शांतिपूर्ण धार्मिक गतिविधियों में पुलिस या प्रशासन अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपने घर में प्रार्थना करने के लिए पूर्व अनुमति लेने की बाध्यता नहीं है।

यह फैसला जांजगीर-चांपा जिले के नवागढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम गोधना से जुड़े मामले में आया, जहां एक परिवार द्वारा अपने घर में वर्षों से प्रार्थना सभा आयोजित की जा रही थी। इसके बावजूद पुलिस द्वारा बार-बार नोटिस जारी कर इन सभाओं को रोकने का प्रयास किया जा रहा था।

कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि निजी आवास में शांतिपूर्ण प्रार्थना करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। पुलिस केवल आशंका के आधार पर धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कानून-व्यवस्था बिगड़ने की वास्तविक स्थिति में ही कार्रवाई उचित होगी।

पुलिस की कार्रवाई पर सख्ती
अदालत ने पुलिस द्वारा जारी नोटिसों को अनुचित ठहराते हुए 18 अक्टूबर 2025, 22 नवंबर 2025 और 1 फरवरी 2026 के सभी नोटिस तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिए। साथ ही पुलिस को निर्देश दिया कि नागरिकों को जांच के नाम पर अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए।

धार्मिक स्वतंत्रता पर अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि संविधान सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, बशर्ते इससे सार्वजनिक शांति भंग न हो।
इस फैसले को धार्मिक स्वतंत्रता और निजी अधिकारों के संरक्षण के रूप में देखा जा रहा है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि निजी परिसरों में होने वाली शांतिपूर्ण धार्मिक गतिविधियों पर प्रशासनिक रोक उचित नहीं मानी जाएगी, जब तक कि उससे कानून-व्यवस्था प्रभावित न हो।





































