KANKER NEWS. कांकेर जिले से आज दो ऐसी तस्वीरें सामने आईं, जिन्होंने बदलते बस्तर की नई पहचान को उजागर कर दिया। एक ओर वर्षों से संघर्ष और चुनौतियों के बीच अटकी रावघाट रेल परियोजना आखिरकार अपने अंतिम चरण तक पहुंच गई, तो दूसरी ओर कभी विकास कार्यों का विरोध करने वाले आत्मसमर्पित पूर्व नक्सली उसी रेल में उत्साह के साथ सफर करते दिखाई दिए। इन तस्वीरों ने यह संदेश दिया कि अब बस्तर बंदूक नहीं, विकास और विश्वास की राह पर आगे बढ़ रहा है।

छत्तीसगढ़ की बहुप्रतीक्षित रावघाट रेल परियोजना के अंतिम हिस्से का ट्रायल मंगलवार को सफलतापूर्वक पूरा किया गया। पहली बार ट्रेन ताडोकी से रावघाट तक पहुंची। रावघाट इस परियोजना का अंतिम स्टेशन माना जा रहा है। करीब वर्ष 2007 में शुरू हुई इस महत्वाकांक्षी परियोजना को पूरा होने में लगभग 21 साल लग गए। इस लंबे सफर में सबसे बड़ी चुनौती नक्सलवाद रहा, जिसने कई बार निर्माण कार्यों की रफ्तार थाम दी।

कठिन परिस्थितियों और सुरक्षा चुनौतियों के बीच आखिरकार रेल इंजन अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंच गया। इस परियोजना को पूरा करने में कई सुरक्षाबलों के जवानों, कर्मचारियों और स्थानीय नागरिकों ने भी अपनी जान गंवाई। इसके बावजूद विकास की यह यात्रा नहीं रुकी।

वहीं दूसरी ओर भानुप्रतापपुर में एक भावुक और प्रेरणादायक तस्वीर देखने को मिली। आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों को जिला पुलिस ने पहली बार रेल यात्रा कराई। ट्रेन में बैठते ही उनके चेहरों पर खुशी, जिज्ञासा और नए जीवन की उम्मीद साफ दिखाई दी। कभी ऐसा समय था जब नक्सलियों की गतिविधियों के चलते रेल सेवाएं प्रभावित हो जाती थीं और रेल परियोजनाएं उनके निशाने पर रहती थीं। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।

जो लोग कभी विकास के खिलाफ हथियार उठाते थे, आज वही लोग विकास की नई पटरियों पर सफर करते नजर आए। भानुप्रतापपुर से सामने आई ये तस्वीरें केवल एक खबर नहीं, बल्कि बस्तर में बदलते दौर का प्रतीक हैं। यह बदलाव बताता है कि अब क्षेत्र में हिंसा की जगह विकास की रफ्तार और विश्वास की नई कहानी लिखी जा रही है।




































