BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल प्रेम संबंध का टूट जाना या विवाह से इनकार कर देना, किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने का ठोस सबूत नहीं माना जा सकता। जस्टिस संजय एस. अग्रवाल की बेंच ने निचली अदालत द्वारा आरोपी को दोषमुक्त किए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य शासन की अपील को खारिज कर दिया है।

मामला बिलासपुर जिले के चकरभाठा थाना क्षेत्र का है। सुनील कुमार साहू और एक 21 वर्षीय युवती के बीच प्रेम संबंध थे। दोनों साल 2016 में शादी करना चाहते थे, लेकिन युवक के माता-पिता इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं थे। इसी दौरान युवती ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। आरोप था कि घटना से कुछ दिन पहले दोनों के बीच विवाद हुआ था और युवक ने शादी से इनकार कर दिया था, जिससे आहत होकर युवती ने यह कदम उठाया।

पुलिस कार्रवाई और निचली अदालत का फैसला
पुलिस ने सुनील के खिलाफ धारा 306 आईपीसी (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत केस दर्ज कर उसे जेल भेज दिया था। हालांकि, 23 जनवरी 2017 को चतुर्थ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने सबूतों के अभाव में आरोपी को दोषमुक्त कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ राज्य शासन ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि मृतका के पास से मिले सुसाइड नोट में आरोपी पर उकसाने का कोई आरोप नहीं लगाया गया था। मृतका के परिजनों (माता, पिता और बहन) ने शादी से इनकार की बात तो कही, लेकिन उनके सामने ऐसी कोई सीधी बातचीत नहीं हुई थी जिससे उकसावा साबित हो। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 306 के तहत सजा के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाने में प्रत्यक्ष और सक्रिय भूमिका निभाई हो।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जब तक अभियोजन पक्ष यह साबित न कर दे कि आरोपी की भूमिका सीधे तौर पर सक्रिय थी, तब तक उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। केवल शादी से मना करना उकसावे की श्रेणी में नहीं आता। इसी आधार पर अदालत ने जिला कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।





































