BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) के मामलों में महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि पत्नी की आय, संपत्ति और कमाई के स्रोतों से जुड़े शपथ पत्र पर पति को जिरह करने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष सुनवाई के लिए दोनों पक्षों को एक-दूसरे की वित्तीय स्थिति और आय से जुड़ी जानकारी की जांच करने का समान अवसर मिलना जरूरी है।
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने दुर्ग फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें पति को पत्नी के आय संबंधी शपथ पत्र और कमाई के स्रोतों पर सवाल पूछने से रोक दिया गया था।

BNSS की धारा 144 के तहत मांगा था भरण-पोषण
मामला रायपुर निवासी एक महिला से जुड़ा है, जिसने दुर्ग फैमिली कोर्ट में पति के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के तहत भरण-पोषण के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था। इस प्रावधान ने नए कानून के लागू होने के बाद CrPC की धारा 125 का स्थान लिया है।
सुप्रीम कोर्ट के रजनेश बनाम नेहा मामले में जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार पत्नी ने अपनी संपत्ति और आय से संबंधित विवरण का शपथ पत्र फैमिली कोर्ट में प्रस्तुत किया था।
सुनवाई के दौरान पति की ओर से पत्नी के शपथ पत्र और उसकी आय के स्रोतों को लेकर सवाल पूछे जा रहे थे। इस पर दुर्ग फैमिली कोर्ट के द्वितीय अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने 3 अगस्त 2026 को ऐसे सवालों पर रोक लगा दी थी।

हाईकोर्ट पहुंचा पति, कहा- बचाव का अधिकार प्रभावित होगा
फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ पति ने हाईकोर्ट का रुख किया। याचिका में कहा गया कि पत्नी के शपथ पत्र और आय के स्रोतों पर जिरह का अवसर नहीं मिलने से उसका पक्ष कमजोर होगा और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
हाईकोर्ट ने पति के तर्क को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि आगामी 11 सितंबर को होने वाली सुनवाई में पति को पत्नी के शपथ पत्र और आय से जुड़े तथ्यों पर सवाल पूछने का अवसर दिया जाए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले पूछे जा चुके सवालों को दोहराया नहीं जाए, ताकि समय की अनावश्यक बर्बादी न हो और गवाही की प्रक्रिया उसी दिन पूरी की जा सके।

किसी पक्ष के बचाव का अधिकार खत्म नहीं होना चाहिए
जस्टिस व्यास ने कहा कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे की आय और वित्तीय स्थिति से संबंधित दावों की जांच करने का उचित अवसर मिलना चाहिए। फैमिली कोर्ट को ऐसी प्रक्रिया नहीं अपनानी चाहिए, जिससे किसी पक्ष का अपना कानूनी बचाव प्रस्तुत करने का अधिकार प्रभावित या समाप्त हो जाए।
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को आदेश की प्रति संबंधित फैमिली कोर्ट के जज को तत्काल भेजने के निर्देश भी दिए हैं, ताकि भविष्य में इस तरह के मामलों में आवश्यक सावधानी बरती जा सके।

क्या है BNSS की धारा 144?
नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद भरण-पोषण से संबंधित पुरानी CRPC की धारा 125 की जगह अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 लागू है। इसके तहत पर्याप्त साधन होने के बावजूद पत्नी, नाबालिग या असमर्थ बच्चों अथवा माता-पिता के भरण-पोषण की उपेक्षा या इनकार करने पर न्यायालय गुजारा भत्ता और अंतरिम कानूनी खर्च देने का आदेश दे सकता है।





































