BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सगे भाई-बहनों के बच्चों (जैसे मौसी की बेटी या बुआ का लड़का) के बीच विवाह ‘प्रतिषिद्ध नातेदारी’ (Prohibited Relationship) की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी शादियां कानूनन शून्य (In-valid) हैं। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच ने जांजगीर-चांपा के एक मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।

क्या है पूरा मामला?
मामला जांजगीर-चांपा जिले का है, जहाँ एक व्यक्ति का विवाह 20 अप्रैल 2018 को हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद ही पति-पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गया। इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट में आवेदन देकर शादी को शून्य घोषित करने की मांग की। पति का तर्क था कि उसकी मां और पत्नी की मां सगी बहनें हैं। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(iv) के अनुसार, इस तरह की नातेदारी में शादी अवैध है।


फैमिली कोर्ट का तर्क और हाईकोर्ट की टिप्पणी
इससे पहले फैमिली कोर्ट ने माना था कि दोनों मौसी के बच्चे हैं, लेकिन पटेल समाज में ‘ब्रह्म विवाह’ के नाम पर ऐसी शादियां प्रचलित हैं, इसलिए उसे वैध मान लिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सिर्फ “परंपरा” या “प्रथा” का हवाला देना काफी नहीं है। किसी भी प्रथा को कानून का दर्जा पाने के लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि वह प्राचीन है, लगातार चलन में है और सार्वजनिक नीति व कानून के अनुरूप है।

पत्नी को गुजारा भत्ता पाने का अधिकार
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसी किसी रूढ़ि को पुख्ता तौर पर साबित नहीं किया गया है, जिसके आधार पर प्रतिषिद्ध नातेदारी के भीतर विवाह को अनुमति दी जा सके। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने शादी को शून्य घोषित कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह रद्द होने के बावजूद पीड़ित पक्ष (पत्नी) धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता (Maintenance) के लिए आवेदन करने की हकदार बनी रहेगी।



































