BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति प्रक्रिया पर सख्त रुख अपनाते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि योग्यता और वरिष्ठता को नजरअंदाज कर की गई पदोन्नति वैध नहीं मानी जाएगी। इसी के साथ कोर्ट ने विवादित प्रमोशन लिस्ट को निरस्त कर विभाग को नई प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
यह आदेश जस्टिस पी.पी. साहू की सिंगल बेंच ने सुनवाई के दौरान पारित किया। मामला रायपुर नगर निगम में सहायक ग्रेड-2 पद पर कार्यरत भारतेश नेताम की याचिका से जुड़ा था।

याचिकाकर्ता भारतेश नेताम ने कोर्ट को बताया कि वे पिछले पांच वर्षों से कार्यरत हैं और आवश्यक लेखा प्रशिक्षण भी पूरा कर चुके हैं। वर्ष 2018 के नियमों के अनुसार वे सहायक लेखा अधिकारी पद पर पदोन्नति के पात्र थे। इसके बावजूद 14 जनवरी 2025 को हुई विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की बैठक में उनके नाम पर विचार नहीं किया गया, जबकि उनसे जूनियर कर्मचारियों को प्रमोट कर दिया गया।

कोर्ट में क्या हुई बहस?
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे ने तर्क रखा कि नेताम ने पहले सहायक ग्रेड-1 के पद पर प्रमोशन इसलिए छोड़ा था ताकि वे लेखा विभाग में आगे बढ़ सकें। इसके बावजूद 17 जनवरी 2025 के आदेश में उनसे जूनियर कर्मचारियों को पदोन्नति देना नियमों के खिलाफ है।
वहीं, प्रतिवादी पक्ष ने दलील दी कि पहले प्रमोशन छोड़ने के कारण नियमानुसार एक वर्ष तक उनके नाम पर विचार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट का सख्त रुख
कोर्ट ने प्रतिवादी पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि पात्र उम्मीदवार की अनदेखी करना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने अपने आदेश में—
-17 जनवरी 2025 की प्रमोशन सूची को तत्काल प्रभाव से रद्द किया
-नई विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) गठित करने के निर्देश दिए
-सभी पात्र कर्मचारियों के नाम पर नियमों के तहत पुनः विचार करने को कहा
-अदालत ने स्पष्ट किया कि पदोन्नति में योग्यता और वरिष्ठता मूल आधार हैं, इन्हें नजरअंदाज कर की गई प्रक्रिया स्वीकार्य नहीं होगी।

क्या होगा असर?
इस फैसले से न केवल संबंधित मामले में बल्कि अन्य विभागों की पदोन्नति प्रक्रियाओं पर भी असर पड़ सकता है। अब विभागों को प्रमोशन देते समय नियमों और पारदर्शिता का विशेष ध्यान रखना होगा, वरना न्यायिक हस्तक्षेप की संभावना बनी रहेगी।

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