BHILAI NEWS. छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य जगत में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के नाम का दुरुपयोग कर अस्पतालों को ब्लैकमेल करने वाले एक कथित पत्रकार का पर्दाफाश हुआ। आरोपी ने न केवल संदिग्ध लेटरहेड का सहारा लिया, बल्कि शासन-प्रशासन को भी गुमराह कर अस्पतालों की जांच तक करवा दी। अब पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

मुफ्त इलाज कराया, फिर अस्पताल से ही मांगे 5 लाख
पूरा मामला भिलाई के एसबीएस (SBS) अस्पताल से जुड़ा है। अस्पताल प्रबंधक निर्मल सिंह द्वारा दर्ज कराई गई FIR के अनुसार:
- नि:शुल्क सेवा का लाभ: आरोपी गुरमीत सिंह वाधवा ने पिछले साल अस्पताल से कैंसर के महंगे इंजेक्शन लगवाए। अस्पताल के सेवाभावी उद्देश्य को देखते हुए डायरेक्टर के निर्देश पर उसे यह इलाज नि:शुल्क उपलब्ध कराया गया।
- ब्लैकमेलिंग की शुरुआत: इलाज के बाद आरोपी ने बिल की मांग की। जब अस्पताल ने लागत मूल्य का बिल दिया (जिसका भुगतान आरोपी ने नहीं किया), तो उसने उसी बिल को ‘फर्जी’ बताकर ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया।
- रंगदारी और अभद्रता: आरोप है कि गुरमीत ने अस्पताल प्रबंधक के चेंबर में घुसकर 5 लाख रुपये की मांग की। पैसे न देने पर 21 अक्टूबर 2025 को अस्पताल में गाली-गलौज की और RTI के नाम पर अस्पताल को धमकी दी।

केन्द्रीय मंत्री के नाम का ‘फर्जी’ खेल और प्रशासनिक चूक
इस प्रकरण का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि आरोपी ने खुद को ‘फोर्ब्स इंटरनेशनल मैग्जीन’ का प्रबंध संपादक बताकर छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखा।

- दावा: पत्र में आरोपी ने दावा किया कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने उसे व्यक्तिगत रूप से छत्तीसगढ़ के हर जिले में 5 अस्पतालों की जांच करने का जिम्मा सौंपा है। पत्र के साथ एक फोटो भी भेजी गई, जिसमें आरोपी केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री के साथ खड़ा हुआ है।
- प्रशासनिक सक्रियता: हैरानी की बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग ने इस पत्र की सत्यता की जांच किए बिना ही इसे निचले स्तर तक फॉरवर्ड कर दिया। अवर सचिव से होता हुआ मामला दुर्ग CMHO तक पहुंचा और बाकायदा अस्पताल की जांच कराई गई। हालांकि, जांच में अस्पताल के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप झूठे पाए गए। दुर्ग जिले में और भी अस्पतालों की जांच इसी पत्र के बाद कराई गई।

उठते सवाल: क्या यह किसी बड़े सिंडिकेट का हिस्सा है?
इस घटना ने शासन की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
- सत्यापन में चूक: क्या स्वास्थ्य विभाग ने यह जानने की कोशिश की कि क्या केन्द्रीय मंत्री किसी निजी व्यक्ति को जांच का जिम्मा सौंप सकते हैं?
- फोर्ब्स का लेटरहेड: अंतरराष्ट्रीय स्तर की मैग्जीन के नाम पर चल रहे इस मामले को पहचानने में प्रशासन नाकाम क्यों रहा? हालांकि फोर्ब्स इंटरनेशनल नाम से RNI की साइट पर कोई पंजीकृत पत्रिका नजर नहीं आई और न ही लैडरहेड पर दिए गए रीजनल ऑफिस के नंबरों से कोई संपर्क हो पाया।
- अन्य शिकार: आशंका जताई जा रही है कि आरोपी ने इसी तरह प्रदेश के कई अन्य अस्पतालों को भी अपनी ब्लैकमेलिंग का शिकार बनाया होगा।
फिलहाल, पुलिस इस ‘बड़े खेल’ की परतों को उधेड़ने में जुट गई है।





































