BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि डीएनए जांच में जैविक पिता साबित होने के बाद कोई व्यक्ति अपने बच्चे की परवरिश की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने जैविक पिता को 1 सितंबर 2026 से तीन वर्षीय बच्चे के लिए हर महीने ₹5 हजार भरण-पोषण देने का आदेश दिया है। हालांकि, कोर्ट ने महिला के स्वयं के भरण-पोषण के दावे को खारिज करने वाले फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।


फैमिली कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट में दी गई चुनौती
सिरगिट्टी थाना क्षेत्र के तिफरा निवासी महिला ने अपने और तीन वर्षीय बेटे के भरण-पोषण के लिए फैमिली कोर्ट में धारा 125 के तहत आवेदन प्रस्तुत किया था। प्रथम अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट ने 29 दिसंबर 2025 को महिला और बच्चे दोनों की अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद महिला और उसके बेटे की ओर से हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की गई।

डीएनए रिपोर्ट ने कर दिया पितृत्व साबित
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। पुलिस जांच के दौरान कराई गई डीएनए जांच में यह साबित हो चुका था कि सीपत चौक निवासी युवक ही तीन वर्षीय बच्चे का जैविक पिता है। इसके अलावा सिरगिट्टी थाने में हुए पूर्व समझौते में भी युवक ने बच्चे को अपने पास रखने की बात स्वीकार की थी।

मां का दावा खारिज, लेकिन बच्चे का हक बरकरार
हाईकोर्ट ने कहा कि महिला के स्वयं के भरण-पोषण के दावे को खारिज करने का फैमिली कोर्ट का फैसला उपलब्ध तथ्यों पर आधारित था, इसलिए उसमें हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। लेकिन बच्चे का भरण-पोषण मां के दावे से अलग और स्वतंत्र अधिकार है।
कोर्ट ने माना कि तीन साल के मासूम की अपनी कोई आय नहीं है और उसकी भोजन, कपड़े, शिक्षा, चिकित्सा तथा अन्य बुनियादी जरूरतों की जिम्मेदारी उठाना पिता का कानूनी और नैतिक दायित्व है।

1 सितंबर से हर महीने मिलेंगे ₹5000
हाईकोर्ट ने जैविक पिता को आदेश दिया कि वह 1 सितंबर 2026 से बच्चे के भरण-पोषण के लिए ₹5 हजार प्रतिमाह अदा करे। फैसले ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि पितृत्व डीएनए जांच से स्थापित होने के बाद नाबालिग बच्चे के अधिकार और उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पिता को अलग नहीं किया जा सकता।





































