BILASPUR NEWS. चुनाव याचिका की सुनवाई में एक प्रक्रियागत चूक मुंगेली कलेक्टर पर भारी पड़ गई। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पाया कि बिना गवाहों के बयान दर्ज किए और विवादित बिंदु तय किए ही चुनाव याचिका खारिज कर दी गई थी। इसी एक गलती को गंभीर मानते हुए हाई कोर्ट ने कलेक्टर का पूरा आदेश निरस्त कर दिया और 60 दिनों के भीतर नए सिरे से सुनवाई कर फैसला देने का निर्देश दिया है।

मामला मुंगेली जिले की जनपद पंचायत लोरमी के क्षेत्र क्रमांक-23 (राजपुर) के सदस्य पद के चुनाव से जुड़ा है। चुनाव में मूलचंद दाहिरे को विजेता घोषित किए जाने के बाद प्रत्याशी पंकज रात्रे ने मतगणना और फॉर्म-18 में दर्ज मतों की संख्या में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए पुनर्मतगणना की मांग की थी। इसके लिए उन्होंने छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा-122 के तहत चुनाव याचिका दायर की।

यहीं हुई बड़ी चूक
7 जनवरी 2026 को तत्कालीन मुंगेली कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी ने याचिका पर फैसला सुनाते हुए उसे सीधे खारिज कर दिया। न तो विवादित बिंदु (Issues) तय किए गए और न ही दोनों पक्षों को गवाह और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया। इसी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे ने दलील दी कि पंचायत चुनाव याचिकाओं की सुनवाई सिविल मुकदमे की तरह होती है। ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। बिना साक्ष्य और गवाही के याचिका खारिज करना कानून के विपरीत है।

हाई कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने कहा कि चुनाव याचिका का फैसला पूरी सुनवाई के बाद ही किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी पक्ष को सुने बिना और आवश्यक प्रक्रिया अपनाए बिना याचिका खारिज करना न्यायसंगत नहीं है।

60 दिन में फिर होगी सुनवाई
हाई कोर्ट ने कलेक्टर का आदेश रद्द करते हुए मामला वापस उनके पास भेज दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि दोनों पक्षों के विवादित बिंदु तय किए जाएं, साक्ष्य और गवाहों को रिकॉर्ड किया जाए तथा सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए 60 दिनों के भीतर नया निर्णय सुनाया जाए।
इस फैसले को चुनाव याचिकाओं में प्राकृतिक न्याय और विधिक प्रक्रिया के पालन को लेकर एक महत्वपूर्ण नज़ीर माना जा रहा है।






































