BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने ‘आबादी’ घोषित जमीनों पर रह रहे ग्रामीणों को बड़ी राहत देते हुए ग्राम पंचायतों द्वारा की जा रही जबरन बेदखली और दंडात्मक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। जस्टिस ए.के. प्रसाद की एकलपीठ ने खेमचंद साहू सहित आठ ग्रामीणों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक ग्राम पंचायत याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई भी कठोर कदम नहीं उठा सकेगी।

मामला नांदघाट ग्राम पंचायत से जुड़ा है, जहां पंचायत ने ग्रामीणों को कथित बेजा कब्जा हटाने के लिए नोटिस जारी किया था। पंचायत का आरोप था कि ग्रामीणों ने गौरी-गौरा तालाब, मरघट रोड, गौठान और अन्य शासकीय भूमि पर मकान बनाकर कब्जा कर रखा है। ग्राम सभा के प्रस्ताव के आधार पर सात दिनों के भीतर कब्जा हटाने की चेतावनी भी दी गई थी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार वाजपेयी ने कोर्ट को बताया कि विवादित भूमि को पहले ही अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) और जिला कलेक्टर के आदेशों के तहत ‘आबादी भूमि’ घोषित किया जा चुका है। इसके बावजूद पंचायत द्वारा कार्रवाई की जा रही है, जो कानूनन उचित नहीं है।

दलीलों और उपलब्ध अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ताओं का पक्ष विचारणीय है। कोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए राज्य शासन और सरपंच नांदघाट को नोटिस जारी कर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

मामले में राज्य शासन की ओर से पैनल लॉयर श्रेयांश मेहता ने नोटिस स्वीकार किया। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को ‘हमदस्त तामीली’ की अनुमति भी प्रदान की है, ताकि आदेश की प्रति तत्काल संबंधित पक्षों तक पहुंचाई जा सके। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।

क्या है हाई कोर्ट के आदेश का असर?
हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद फिलहाल संबंधित ग्रामीणों के मकान या कब्जे को हटाने की कोई कार्रवाई नहीं की जा सकेगी। मामले के अंतिम निर्णय तक ग्रामीणों को राहत मिली है, वहीं पंचायत और प्रशासन को अपने पक्ष में जवाब पेश करना होगा।





































