BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य के हजारों पेंशनभोगियों के हित में बड़ा फैसला सुनाते हुए 59 महीने के लंबित एरियर के भुगतान का रास्ता साफ कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने राज्य सरकार की रिट अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच वित्तीय हिस्सेदारी या आपसी सहमति का विवाद पेंशनरों के वैधानिक अधिकारों में बाधा नहीं बन सकता।

मामला ‘छत्तीसगढ़ पेंशनर्स समाज’ द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में बताया गया था कि छठवें और सातवें वेतन आयोग के लाभ लागू करते समय राज्य सरकार ने अलग-अलग कट-ऑफ तिथियां तय कर सेवानिवृत्त कर्मचारियों के साथ भेदभाव किया। इसके चलते छठवें वेतन आयोग के तहत 32 महीने और सातवें वेतन आयोग के तहत 27 महीने, यानी कुल 59 महीने का एरियर पेंशनरों को नहीं मिल सका।

इससे पहले 1 अप्रैल 2026 को हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने सरकार के दोनों सर्कुलरों को भेदभावपूर्ण और संविधान के समानता के अधिकार के विपरीत बताते हुए निरस्त कर दिया था। साथ ही सरकार को 120 दिनों के भीतर एरियर का भुगतान करने का आदेश दिया था। सिंगल बेंच ने यह भी कहा था कि भुगतान के बाद यदि मध्य प्रदेश सरकार की हिस्सेदारी बनती है तो उसका दावा अलग से किया जा सकता है।

राज्य सरकार ने इस आदेश को डिवीजन बेंच में चुनौती देते हुए दलील दी कि कट-ऑफ तिथि से पहले सेवानिवृत्त कर्मचारियों को समान लाभ नहीं दिया जा सकता। साथ ही यह भी कहा कि मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के तहत दोनों राज्यों की सहमति के बिना एरियर भुगतान संभव नहीं है।

डिवीजन बेंच ने सरकार की सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि दो राज्यों के बीच प्रशासनिक या वित्तीय विवाद का खामियाजा उन पेंशनरों को नहीं भुगतना चाहिए, जिन्होंने अपना पूरा कार्यकाल सरकारी सेवा में बिताया है। अदालत ने सिंगल बेंच के आदेश को बरकरार रखते हुए सरकार की अपील निरस्त कर दी।
इस फैसले के बाद राज्य के हजारों पेंशनभोगियों को छठवें और सातवें वेतन आयोग के तहत लंबे समय से लंबित 59 महीने के एरियर भुगतान की उम्मीद मजबूत हो गई है।






































