BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि बालिग होने के बाद भी अविवाहित बेटी के प्रति पिता की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। हाईकोर्ट ने कहा कि बेटी को गुजारा भत्ता देना पिता का केवल कानूनी ही नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक दायित्व भी है।

चीफ जस्टिस की एकलपीठ ने मनेंद्रगढ़ फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए पिता द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि पिता अपनी 20 वर्षीय बेटी को प्रतिमाह 5,000 रुपये भरण-पोषण राशि का भुगतान जारी रखे।

क्या है मामला?
मामला कोरिया और एमसीबी जिले से जुड़ा है। ग्राम तेंदुआ निवासी गोरखनाथ यादव ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी बेटी प्रिया को हर महीने 5,000 रुपये भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
वर्ष 2016 में फैमिली कोर्ट ने पहली बार 2,000 रुपये मासिक भरण-पोषण तय किया था। बाद में 2023 में इसे बढ़ाकर 5,000 रुपये कर दिया गया। जब बेटी ने राशि बढ़ाने की मांग की, तब पिता ने आवेदन देकर कहा कि बेटी बालिग हो चुकी है, इसलिए भरण-पोषण बंद किया जाए।

पिता ने उठाए रिश्ते पर सवाल
याचिका में पिता ने दावा किया कि लड़की की मां उनकी कानूनी पत्नी नहीं है और उनके ऊपर वर्तमान परिवार तथा बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारियां भी हैं। वहीं बेटी की ओर से दलील दी गई कि अविवाहित बालिग बेटी को कानून के तहत भरण-पोषण पाने का अधिकार है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि वर्ष 2016 से बेटी को लगातार भरण-पोषण राशि मिल रही है और पिता ने कभी उस आदेश को चुनौती नहीं दी। अदालत ने कहा कि इतने वर्षों बाद रिश्ते की वैधता पर सवाल उठाना उचित नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपनी संतान का पालन-पोषण करना पिता का सामाजिक और कानूनी दायित्व है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पिता की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया।






































