BILASPUR NEWS. आदिवासी जमीन पर गैर-आदिवासी के कब्जे और मालिकाना हक को लेकर तीन दशक से ज्यादा समय से चल रही कानूनी लड़ाई में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी जमीन की रजिस्टर्ड बिक्री विलेख आदिवासी के नाम होने भर से गैर-आदिवासी के वास्तविक कब्जे और जमीन के उपयोग की जांच नहीं रोकी जा सकती। कोर्ट ने माना कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170-बी का उद्देश्य आदिवासी भूमि को ऐसे कब्जों से संरक्षण देना है, जो कानूनन वैध नहीं हैं।

डिविजन बेंच ने सिंगल बेंच के 20 मार्च 2024 के आदेश को बरकरार रखते हुए गैर-आदिवासी पक्ष की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही एसडीएम, कलेक्टर और कमिश्नर कोर्ट सहित राजस्व अधिकारियों द्वारा पारित पूर्व आदेशों को भी सही ठहराया गया।

कागजों में आदिवासी, जमीन पर किसी और का कब्जा
मामला ग्राम नया बाराद्वार की सर्वे नंबर 665/1 की 0.29 एकड़ जमीन से जुड़ा है। रिकॉर्ड के मुताबिक जमीन मूल रूप से लतीराम के नाम थी, जिसके बाद उनके बेटे धनीराम के नाम दर्ज हुई। धनीराम ने 23 मई 1979 को 5 हजार रुपये में रजिस्टर्ड बिक्री विलेख के जरिए जमीन आदिवासी समुदाय के फिरतू राम को हस्तांतरित की थी।
फिरतू राम की मृत्यु के बाद जमीन गोकुल राम और बाद में उनके कानूनी वारिसों के नाम दर्ज हुई। हालांकि, बाद में शिकायत सामने आई कि राजस्व रिकॉर्ड में जमीन आदिवासी पक्ष के नाम होने के बावजूद उसका वास्तविक कब्जा और उपयोग गैर-आदिवासी लखनलाल राठौर के पास है।

170-बी के तहत शुरू हुई जांच
जानकी बाई की शिकायत पर धारा 170-बी के तहत कार्रवाई शुरू हुई। राजस्व अधिकारियों ने पटवारी रिपोर्ट, नोटिस, पक्षकारों के बयान और गवाहों के आधार पर मामले की जांच की। जांच के बाद एसडीएम ने जमीन आदिवासी पक्ष को वापस करने का आदेश दिया।
इसके बाद मामला अपील-दर-अपील आगे बढ़ता गया। कलेक्टर ने एक चरण में एसडीएम का आदेश रद्द कर दोबारा सुनवाई के निर्देश दिए। पुनः सुनवाई के बाद 11 फरवरी 2003 को एसडीएम ने जमीन वापसी का फैसला सुनाया।
एसडीएम से हाईकोर्ट तक नहीं बदला फैसला
एसडीएम के आदेश के खिलाफ मामला कलेक्टर और फिर कमिश्नर कोर्ट तक पहुंचा। 3 मार्च 2004 और 30 नवंबर 2009 के आदेशों में राजस्व अदालतों ने एसडीएम के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद बोर्ड ऑफ रेवेन्यू में भी गैर-आदिवासी पक्ष को राहत नहीं मिली।
मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो सिंगल बेंच ने भी राजस्व अदालतों के फैसलों को सही माना। अब डिविजन बेंच ने भी इस आदेश पर मुहर लगाते हुए अपील खारिज कर दी।

कोर्ट का अहम संदेश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि धारा 170-बी के तहत केवल कागजी रिकॉर्ड देखना पर्याप्त नहीं है। जमीन पर वास्तविक कब्जा किसका है, उसका उपयोग कौन कर रहा है और लेनदेन की वास्तविक प्रकृति क्या है, इसकी जांच राजस्व अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आती है। कोर्ट की इस टिप्पणी को आदिवासी भूमि के संरक्षण से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।




































