BILASPUR NEWS. करीब 24 साल पुराने भ्रष्टाचार मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दोषी लोक सेवक को बड़ा झटका दिया है। रिश्वत लेने के मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को चुनौती देने वाली अपील को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। आरोपी की अपील लंबित रहने के दौरान ही मृत्यु हो चुकी थी, जिसके बाद उसके कानूनी वारिस मामले की पैरवी कर रहे थे।

हाईकोर्ट की जस्टिस एन.के. व्यास की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि रिश्वत की मांग और रकम स्वीकार करने के संबंध में अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य विश्वसनीय और पर्याप्त हैं। आरोपी के पास से बरामद दागी नोटों को लेकर कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण भी प्रस्तुत नहीं किया जा सका।
निचली अदालत ने सुनाई थी 4 साल की सजा
रायपुर के विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एवं प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश ने 3 मई 2002 को आरोपी को भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराया था। अदालत ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत एक वर्ष के सश्रम कारावास और 2 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी।
वहीं, धारा 13(1)(डी) सहपठित धारा 13(2) के तहत तीन वर्ष के सश्रम कारावास और 5 हजार रुपए जुर्माने से भी दंडित किया गया था।

वेतन और चिकित्सा अवकाश के बदले मांगे थे 10 हजार रुपए
मामले की शुरुआत 23 फरवरी 2000 को हुई थी, जब शिकायतकर्ता बालमुकुंद पटेल ने पुलिस अधीक्षक, लोकायुक्त रायपुर के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, उसका चिकित्सा अवकाश स्वीकृत नहीं किया गया था और फरवरी 1999, सितंबर 1999, अक्टूबर 1999 तथा दिसंबर माह के 15 दिनों का वेतन रोक दिया गया था।
आरोप था कि वेतन जारी करने और चिकित्सा अवकाश का निपटारा करने के एवज में आरोपी लक्ष्मण दास लहरे ने 10 हजार रुपए की रिश्वत मांगी। आरोपी ने 5 हजार रुपए तत्काल और शेष 5 हजार रुपए वेतन जारी होने के बाद देने की बात कही थी।

लोकायुक्त के जाल में फंसा आरोपी
शिकायत के बाद लोकायुक्त पुलिस ने मामले की जांच की और 29 फरवरी 2000 को ट्रैप कार्रवाई की। कार्रवाई के दौरान आरोपी को रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया। उसकी जेब से 4 हजार रुपए की दागी रिश्वत राशि बरामद की गई थी।
दागी नोटों पर नहीं दे सका संतोषजनक जवाब
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में रिश्वत की मांग और स्वीकृति का प्रत्यक्ष अथवा परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से साबित होना आवश्यक है। वर्तमान मामले में अभियोजन पक्ष ने इन तथ्यों को पर्याप्त साक्ष्यों के माध्यम से सिद्ध किया है।
अदालत ने यह भी माना कि आरोपी अपने पास मिले दागी नोटों के संबंध में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका।

मौत के बाद भी जारी रही कानूनी लड़ाई
क्रिमिनल अपील के लंबित रहने के दौरान 22 जून 2014 को मुख्य आरोपी की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उसकी पत्नी और अन्य कानूनी वारिसों ने अपील की पैरवी जारी रखी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने अपील में उठाए गए सभी तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला साक्ष्यों और कानून के अनुरूप है। इसके साथ ही करीब 24 साल पुराने इस भ्रष्टाचार मामले में दोषसिद्धि और सजा के आदेश को बरकरार रखते हुए क्रिमिनल अपील खारिज कर दी गई।





































