BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अधूरी और लापरवाही से तैयार याचिकाओं पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि अदालत के कीमती समय से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने एफआईआर निरस्त करने की मांग वाली एक दोषपूर्ण याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर दो हजार रुपये का जुर्माना लगाया है।

मामला दुर्ग जिले के भिलाई पुरानी बस्ती निवासी बसंत कुमार साहू द्वारा दायर आपराधिक याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत अपने खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराओं 296 और 351(3) में दर्ज एफआईआर को निरस्त करने की मांग की थी।

सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने पाया कि जिस एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई है, उसकी दर्ज होने की तारीख का उल्लेख पूरी याचिका और प्रार्थना पत्र में कहीं भी नहीं किया गया है। इस गंभीर त्रुटि पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इतनी बुनियादी जानकारी के बिना याचिका दाखिल करना अत्यंत लापरवाही का परिचायक है और इससे न्यायालय का बहुमूल्य समय नष्ट होता है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिका की ड्राफ्टिंग बेहद लापरवाही से की गई है, इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹2,000 का जुर्माना लगाया।
डिवीजन बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता भविष्य में संशोधित याचिका दाखिल करना चाहता है तो पहले उसे जुर्माने की राशि जमा करनी होगी। अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि यह राशि बिलासपुर के तिफरा स्थित शासकीय मूक-बधिर एवं दृष्टिबाधित विद्यालय को सहायता स्वरूप प्रदान की जाए।

हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को अधिवक्ताओं और पक्षकारों के लिए स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि न्यायालय में याचिकाएं पूरी तैयारी और आवश्यक तथ्यों के साथ ही प्रस्तुत की जानी चाहिए।






































