BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य फार्मेसी परिषद के रजिस्ट्रार पद को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किसी अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार सौंपना स्थायी नियुक्ति नहीं माना जा सकता। मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें फार्मेसी परिषद के रजिस्ट्रार पद का अतिरिक्त प्रभार दिए जाने के आदेश को निरस्त किया गया था।

खंडपीठ ने कहा कि नियमित नियुक्ति लंबित होने की स्थिति में प्रशासनिक कामकाज प्रभावित न हो, इसके लिए सरकार द्वारा किसी अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार देना एक अंतरिम और अस्थायी व्यवस्था है। इसे किसी भी स्थिति में स्थायी नियुक्ति या पद पर नियमित अधिकार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी परिस्थिति में अनुच्छेद 226 के तहत ‘क्वो वारंटो’ (अधिकार पृच्छा) रिट की शर्तें स्वतः पूरी नहीं होतीं।

क्या था मामला?
मामला छत्तीसगढ़ राज्य फार्मेसी परिषद के रजिस्ट्रार पद से जुड़ा है। राज्य सरकार ने 14 मार्च 2024 को रायपुर स्थित में पदस्थ फार्मासिस्ट अश्वनी गुर्देकर को परिषद के रजिस्ट्रार पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपा था। इसे चुनौती देते हुए डॉ. राकेश गुप्ता ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर दावा किया कि यह नियुक्ति फार्मेसी परिषद नियम 1978 के नियम 96 का उल्लंघन है।
सिंगल बेंच ने याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के आदेश को रद्द कर दिया था, जिसके खिलाफ अश्वनी गुर्देकर ने डिवीजन बेंच में अपील दायर की।

कोर्ट में क्या रहे तर्क?
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुदीप जौहरी और जे.के. गुप्ता ने दलील दी कि अतिरिक्त प्रभार को स्थायी नियुक्ति बताना कानूनी रूप से गलत है। उन्होंने कहा कि नियम 96 केवल नियमित और पूर्णकालिक नियुक्तियों पर लागू होता है, न कि प्रशासनिक जरूरत के तहत दिए गए अतिरिक्त प्रभार पर।
वहीं प्रतिवादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता श्याम सुंदर लाल टेकचंदानी ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता प्रसून भादुड़ी ने अदालत को मामले की स्थिति से अवगत कराया।

राजनीतिक द्वेष का भी आरोप
सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि याचिका राजनीतिक और व्यक्तिगत दुर्भावना से प्रेरित थी। कोर्ट को बताया गया कि डॉ. राकेश गुप्ता को पहले परिषद के मनोनीत सदस्य पद से हटाया गया था, जिसके बाद यह याचिका दायर की गई।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि सरकार को प्रशासनिक शून्यता रोकने के लिए अंतरिम व्यवस्था करने का अधिकार है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ‘धोबे साहू’ मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि जब तक स्पष्ट अवैध कब्जा, गंभीर नियम उल्लंघन या दुर्भावना साबित न हो, तब तक अदालतों को ऐसी अस्थायी व्यवस्थाओं में सीमित दखल देना चाहिए।

अंततः हाई कोर्ट ने सिंगल बेंच के आदेश को निरस्त करते हुए परिषद को रजिस्ट्रार पद पर 8 सप्ताह के भीतर नियमित नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं।




































