BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ की नदियों के संरक्षण को लेकर अब सिर्फ बैठकों और सरकारी फाइलों से काम नहीं चलेगा। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि नदियों को बचाने के लिए ज़मीनी समझ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी है। इसी सोच के साथ कोर्ट ने राज्य सरकार की बनाई कमेटी में बड़ा बदलाव करते हुए प्रशासनिक सचिवों की जगह विषय विशेषज्ञों को शामिल करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट की टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि अब तक नदी संरक्षण योजनाएं कागज़ों तक सीमित रहीं। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह, प्रदूषण नियंत्रण और पुनर्जीवन के लिए केवल प्रशासनिक अनुभव नहीं, बल्कि हाइड्रोलॉजी, पर्यावरण और भूगोल के विशेषज्ञों की भूमिका अहम होगी।

‘सोर्स टू संगम’ मॉडल पर काम
राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि अब नदियों के उद्गम स्थल से लेकर अंतिम प्रवाह तक एक समग्र योजना पर काम शुरू किया गया है। इसके तहत:
-हर जिले में 15 दिनों के भीतर नदी के उद्गम स्थलों की पहचान और सीमांकन होगा
-जियो-टैगिंग और सूचना बोर्ड लगाकर इन स्थलों को चिन्हित किया जाएगा
-शहरों और उद्योगों के गंदे पानी को ट्रीटमेंट के बाद ही नदियों में छोड़ा जाएगा
-पर्यावरण के साथ ‘आस्था और अर्थव्यवस्था’ का जोड़

नई रणनीति में नदियों को केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना भी शामिल है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और इको-टूरिज्म को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

इन 11 नदियों पर रहेगा फोकस
इस प्रोजेक्ट में राज्य की प्रमुख नदियों—अरपा, महानदी, शिवनाथ, हसदेव, तांदुला, पैरी, मांड, केलो, सोन, तिपान और लीलगर—को शामिल किया गया है, जिनके लिए वैज्ञानिक सर्वे और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार की जाएगी।

फंडिंग का मल्टी-सोर्स मॉडल
इस योजना को गति देने के लिए सरकार सिर्फ एक बजट पर निर्भर नहीं रहेगी, बल्कि DMF, मनरेगा और 15वें वित्त आयोग जैसे अलग-अलग स्रोतों से फंड जुटाए जाएंगे।




































