BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक संबंधों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि लंबी अवधि के वैवाहिक रिश्तों में केवल सामान्य आरोपों के आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने बेमेतरा के एक पति द्वारा दायर तलाक की याचिका को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है।
बेमेतरा जिले के रहने वाले गिरधर दुबे, जो पेशे से पुजारी हैं, उन्होंने अपनी पत्नी से तलाक के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत अर्जी लगाई थी। दोनों की शादी करीब 35 साल पहले हुई थी और उनके दो बच्चे भी हैं, जिनकी शादी हो चुकी है।

पति का आरोप है कि पत्नी पिछले 15 सालों से उसे छोड़कर अपनी बेटी और दामाद के साथ रह रही है। पत्नी झगड़ालू स्वभाव की है और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है। इसी आधार पर पति ने इसे परित्याग और क्रूरता मानते हुए तलाक की मांग की थी।

पत्नी ने इन आरोपों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने बताया कि पति उन पर चरित्र का शक करते थे और उनके साथ गाली-गलौज व मारपीट की जाती थी। पत्नी ने कोर्ट को बताया कि वह बीपी और शुगर की मरीज हैं, लेकिन पति ने उनके इलाज का खर्च कभी नहीं उठाया। इसी मजबूरी के कारण उन्हें बेटी के घर जाकर रहना पड़ा।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि केवल पत्नी का अलग रहना तलाक का आधार नहीं हो सकता। इतने पुराने वैवाहिक संबंध में क्रूरता और परित्याग साबित करने के लिए ठोस घटनाएं, साफ आरोप और पुख्ता सबूत जरूरी हैं। सिर्फ अंदाजे या सामान्य आरोपों के आधार पर 35 साल पुराने रिश्ते को खत्म नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी पाया कि पति के गवाहों के बयान सामान्य थे और उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता था, जबकि महिला प्रकोष्ठ की काउंसलिंग रिपोर्ट में पत्नी के आरोप अधिक विश्वसनीय लगे। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने इस अपील को खारिज कर दिया।




































