BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पत्नी की हत्या के एक चर्चित मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी किए गए पति को दोषी ठहराकर उम्रकैद की सजा सुनाई है। न्यायालय ने कहा कि घटना के समय घर में केवल पति-पत्नी मौजूद थे, ऐसे में पत्नी की संदिग्ध मौत की परिस्थितियों का संतोषजनक जवाब देना पति की जिम्मेदारी थी, लेकिन वह ऐसा करने में पूरी तरह विफल रहा।

मामला चकरभाठा थाना क्षेत्र के ग्राम परसदा निवासी दीप नारायण रजक और उसकी पत्नी ममता रजक से जुड़ा है। ममता की संदिग्ध मौत को शुरू में आत्महत्या बताया गया था, जबकि ट्रायल कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए पति समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। हालांकि हाईकोर्ट ने वैज्ञानिक एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर पति को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। अन्य सह-आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में मिली राहत बरकरार रखी गई है।

वाशिंग मशीन और पैसों की मांग को लेकर होती थी प्रताड़ना
मृतका के पिता मनहरणलाल निर्मलकर ने अदालत को बताया कि शादी के कुछ माह बाद ही उनकी बेटी को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा था। पति वाशिंग मशीन, हर महीने दो हजार रुपये और पढ़ाई के खर्च के लिए अतिरिक्त पैसों की मांग करता था। लगातार मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के बीच विवाह के दो वर्ष के भीतर ही ममता की मौत हो गई।

अंदर से बंद कमरे की कहानी जांच में निकली झूठी
घटना के बाद पुलिस और तत्कालीन तहसीलदार एम.आर. गायकवाड़ मौके पर पहुंचे तो शव कमरे में पंखे से लटका मिला। पहली नजर में मामला आत्महत्या जैसा लग रहा था, लेकिन जांच के दौरान पता चला कि कमरे का दरवाजा वास्तव में अंदर से बंद नहीं था। दरवाजे को बाहर से इस तरह बंद किया गया था कि वह अंदर से बंद होने का आभास दे।
जांच अधिकारियों ने पाया कि हल्का धक्का देते ही दरवाजा खुल गया। इससे संदेह गहरा गया कि हत्या के बाद पूरे घटनाक्रम को आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की गई थी।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने बदल दी केस की दिशा
मामले में निर्णायक भूमिका पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने निभाई। डॉक्टर ए.आर. बंजारे ने रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि ममता की मौत फांसी से नहीं बल्कि गला घोंटने और दम घुटने से हुई थी। मृतका के चेहरे, आंखों, भौंहों और दोनों हाथों पर चोटों के गंभीर निशान भी पाए गए, जो संघर्ष और मारपीट की ओर संकेत कर रहे थे।

पति की चुप्पी बनी सबसे बड़ा सबूत
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब घटना के समय घर में केवल पति और पत्नी मौजूद थे, तब पत्नी की मौत की परिस्थितियों की जानकारी पति के पास होना स्वाभाविक था। इसके बावजूद आरोपी कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं दे सका। अदालत ने माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला सीधे आरोपी की ओर इशारा करती है।
फैसले के बाद आरोपी को एक माह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया गया था। बाद में पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।



































