BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य के एमबीबीएस स्नातकों को बड़ी राहत देते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि राज्य सरकार छत्तीसगढ़ मेडिकल, डेंटल एवं फिजियोथेरेपी अंडर ग्रेजुएट प्रवेश नियम-2025 के तहत निर्धारित छह माह की अवधि में नियुक्ति आदेश जारी नहीं करती है, तो छात्रों द्वारा निष्पादित अनिवार्य सेवा बांड स्वतः निरस्त माना जाएगा। यह फैसला न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने दिया।

यह आदेश सीआईएमएस बिलासपुर से एमबीबीएस और अनिवार्य रोटेटिंग इंटर्नशिप पूरी कर चुके नितीन कुमार सिंह, साहिल करी, चंद्र प्रकाश रवि और साक्षी कंवर की ओर से दायर रिट याचिका (WPC No. 6594/2025) पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में चुनौती दी थी कि राज्य सरकार ने छह माह की वैधानिक अवधि के भीतर नियुक्ति आदेश जारी नहीं किया, बावजूद इसके उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) देने से इंकार कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आशुतोष मिश्रा ने तर्क दिया कि नियम 10(6) के अनुसार निर्धारित अवधि में नियुक्ति नहीं होने पर सेवा बांड स्वतः समाप्त हो जाता है और उसके बाद किसी भी काउंसलिंग या नियुक्ति आदेश के माध्यम से उसे पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।

वहीं राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि छात्रों ने प्रवेश के समय सेवा बांड पर हस्ताक्षर किए थे और वे सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में सेवा देने के लिए बाध्य हैं। सरकार ने यह भी दलील दी कि याचिकाकर्ता काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल हुए थे और बाद में नियुक्ति आदेश भी जारी किए गए थे।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि नियम 10(6) पूरी तरह स्पष्ट है। नियम के अनुसार एमबीबीएस पाठ्यक्रम और इंटर्नशिप पूर्ण होने के छह माह के भीतर नियुक्ति आदेश जारी किया जाना अनिवार्य है, अन्यथा सेवा बांड स्वतः समाप्त माना जाएगा।
अदालत ने माना कि वैधानिक समय-सीमा समाप्त होते ही याचिकाकर्ताओं के बांड संबंधी सभी दायित्व खत्म हो चुके थे। इसके चलते बाद में आयोजित काउंसलिंग प्रक्रिया और 24 दिसंबर 2025 को जारी नियुक्ति आदेशों को अप्रभावी एवं गैर-बाध्यकारी घोषित कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ताओं ने काउंसलिंग में भाग लेकर अपने अधिकार छोड़ दिए थे। न्यायालय ने कहा कि किसी वैधानिक अधिकार को केवल काउंसलिंग में भाग लेने के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।
साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को राज्य द्वारा प्रस्तावित पदस्थापना स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता और न ही उनसे सामान्य वर्ग के लिए 25 लाख रुपये तथा आरक्षित वर्ग के लिए 20 लाख रुपये की बांड राशि वसूली जा सकती है।

रिट याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को बिना किसी दंड या बांड राशि की मांग किए तत्काल NOC जारी करने के निर्देश दिए। इसके अलावा पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति स्वास्थ्य विज्ञान एवं आयुष विश्वविद्यालय को भी निर्देशित किया गया कि यदि संबंधित छात्रों को अब तक MBBS की डिग्री नहीं दी गई है, तो उन्हें विधि अनुसार डिग्री प्रदान की जाए।
यह फैसला छत्तीसगढ़ के उन सभी MBBS स्नातकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनके मामलों में नियुक्ति आदेश जारी करने में देरी हुई है। भविष्य में ऐसे मामलों में यह निर्णय एक महत्वपूर्ण कानूनी नजीर के रूप में देखा जाएगा।





































