GARIYABAND NEWS. गरियाबंद जिले के करका के जंगल में अतिक्रमण और पेड़ों की कटाई की जांच करने पहुंची वन विभाग की टीम को ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा। विभाग के अनुसार करीब 50 से 60 ग्रामीणों ने टीम को सरकारी कार्रवाई से रोकने की कोशिश की, जिसके बाद मौके पर विवाद, धक्का-मुक्की और झूमाझटकी की स्थिति बनी। हालांकि इस दौरान किसी वन अधिकारी या कर्मचारी के घायल होने की सूचना नहीं है। वन विभाग की टीम 22 सितंबर 2026 को करका क्षेत्र में कथित अतिक्रमित वनभूमि का निरीक्षण और कार्रवाई के लिए पहुंची थी। विभाग के मुताबिक, टीम जब कथित अतिक्रमित क्षेत्र की ओर आगे बढ़ी तो बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर पहुंच गए और कर्मचारियों को उनके सरकारी कर्तव्यों के निर्वहन से रोकने की कोशिश की गई। विभाग का आरोप है कि इस दौरान मुकेश मरकाम को मौके से ले जाया गया।

घटनाक्रम की वीडियोग्राफी किए जाने की बात भी वन विभाग ने कही है। मामले में वीडियो साक्ष्यों के साथ थाना खल्लारी में FIR दर्ज करने के लिए आवेदन दिए जाने की जानकारी सामने आई है। वन विभाग के मैदानी निरीक्षण में करका क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वन क्षति के संकेत मिलने का दावा किया गया है। विभाग के अनुसार 1,100 से ज्यादा पेड़ों पर गर्डलिंग यानी पेड़ की छाल को चारों ओर से हटाने के निशान मिले। इसके अलावा बड़ी संख्या में कटे हुए पेड़ों के ठूंठ भी मिले हैं। विभाग के प्रारंभिक आकलन के अनुसार 2016 से 2017 के बीच करीब 30 हजार पेड़-पौधे काटे जाने के संकेत मिले हैं। वहीं GPS आधारित आकलन में लगभग 35 हेक्टेयर वनभूमि पर अतिक्रमण के संकेत मिले हैं।

2016 में भी दर्ज हुआ था मामला
करका में वनभूमि से जुड़ा विवाद नया नहीं है। विभागीय जानकारी के अनुसार 2016 में 22 व्यक्तियों के खिलाफ करीब 22 हेक्टेयर घने वन क्षेत्र में कथित अतिक्रमण को लेकर POR दर्ज किया गया था। विभाग के मुताबिक, इस मामले में 2023 में नगरी न्यायालय ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। अब वन विभाग सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन फुटेज, GPS/DGPS मैपिंग और मैदानी साक्ष्यों के आधार पर क्षेत्र की स्थिति का दोबारा आकलन कर रहा है। करका के मौजूदा विवाद की जड़ें कई दशक पुरानी हैं। यह क्षेत्र कभी वन ग्राम था और सोंढूर बांध के कैचमेंट क्षेत्र में तत्कालीन सीतानदी अभयारण्य के अंतर्गत आता था।

वन्यजीवों के आवागमन पर भी असर की चिंता
करका का मामला केवल वनभूमि पर कब्जे और पेड़ों की कटाई तक सीमित नहीं है। विभाग के अनुसार यह इलाका वन्यजीवों और हाथियों के आवागमन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। वन क्षेत्र के लगातार कम होने से वन्यजीवों के आवागमन मार्ग प्रभावित होने और भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। विभाग के अनुसार पिछले चार वर्षों में करीब 1,050 हेक्टेयर अतिक्रमित वनभूमि मुक्त कराई गई है। इसी क्रम में करका क्षेत्र में कार्रवाई की कोशिश और उसके दौरान हुआ विवाद एक पुराने वनभूमि विवाद को फिर सामने ले आया है।

अब जांच में इन सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे
करका में अब सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने पेड़ काटे गए या कितनी वनभूमि पर अतिक्रमण हुआ। सवाल यह भी है कि जिस गांव को सोंढूर बांध के निर्माण के दौरान दशकों पहले विस्थापित कर मुआवजा दिया गया था, उसी क्षेत्र की वनभूमि पर बाद में अतिक्रमण की स्थिति कैसे बनी। सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन सर्वे, DGPS मैपिंग और पुराने विभागीय रिकॉर्ड से अब इस पूरे मामले की तस्वीर और साफ होने की उम्मीद है। वहीं वन विभाग और ग्रामीणों के बीच कार्रवाई को लेकर पैदा हुआ विवाद आने वाले दिनों में इस मामले को और महत्वपूर्ण बना सकता है।




































