CJP PROTEST दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुटी युवाओं की भीड़, हाथों में लहराते पोस्टर और सोशल मीडिया पर लगातार वायरल हो रही लाइव तस्वीरें देश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर बढ़ते असंतोष की कहानी बयां कर रही हैं। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले चल रहे इस प्रदर्शन में छात्र शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे जैसी मांगों को लेकर आवाज उठा रहे हैं। पुलिस बैरिकेड्स के सामने नारे लगाते और अपने मोबाइल फोन से पूरे घटनाक्रम का सीधा प्रसारण करते युवा केवल विरोध नहीं जता रहे, बल्कि व्यवस्था के प्रति अपने घटते भरोसे को भी सामने रख रहे हैं।

इस जनाक्रोश की पृष्ठभूमि में NEET समेत कई प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोप हैं। हालांकि भारत में पेपर लीक की घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं। पिछले कई दशकों में विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं और बोर्ड परीक्षाओं में भी ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं। लेकिन इस बार बड़ी संख्या में युवाओं का सड़कों पर उतरना इस बात का संकेत है कि समस्या अब केवल परीक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह व्यवस्था पर विश्वास के संकट का रूप ले चुकी है।
जनाक्रोश को कैसे देखती है चाणक्य नीति?
चाणक्य नीति और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि असंतोष कभी अचानक पैदा नहीं होता। उसकी जड़ें धीरे-धीरे गहरी होती हैं। बार-बार परीक्षाओं का रद्द होना, पेपर लीक की घटनाएं, वर्षों तक लंबित भर्तियां और शिकायतों पर प्रशासन की चुप्पी जैसी परिस्थितियां जनता के विश्वास को कमजोर करती हैं। यही भरोसा किसी भी सामाजिक व्यवस्था की सबसे मजबूत नींव होता है।

कौटिल्य का प्रसिद्ध सूत्र है
“प्रजा सुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्।”
अर्थात, प्रजा के सुख में ही शासक का सुख और प्रजा के हित में ही उसका हित निहित है। किसी भी शासन की वास्तविक सफलता उसके वैभव या शक्ति में नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा, न्याय और कल्याण सुनिश्चित करने में होती है। यदि इस विचार को CJP के प्रदर्शन के संदर्भ में देखें, तो स्पष्ट होता है कि युवाओं की चिंता केवल किसी एक परीक्षा या नौकरी तक सीमित नहीं है। उनका सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्षों की मेहनत का निष्पक्ष मूल्यांकन होगा? जब उन्हें लगता है कि उनकी प्रतिभा को ईमानदारी से अवसर नहीं मिल रहा, तब निराशा धीरे-धीरे आक्रोश में बदल जाती है।

संवाद ही समाधान की पहली शर्त
यह मुद्दा केवल किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है। अक्सर सत्ता पक्ष संवाद से बचने की कोशिश करता है, क्योंकि उसे आशंका रहती है कि बातचीत को उसकी कमजोरी समझा जाएगा। लेकिन चाणक्य की व्यावहारिक राजनीति इससे अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। चाणक्य के अनुसार, दूरदर्शी शासक संकट के गंभीर रूप लेने का इंतजार नहीं करता। वह असंतोष के शुरुआती संकेतों को पहचानकर समय रहते संवाद स्थापित करता है। संवाद का अर्थ हर मांग को स्वीकार करना नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। सरकार को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि गड़बड़ी कहां हुई, जांच कितने समय में पूरी होगी और दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी।

राजनीतिक समर्थन से मुद्दे की गंभीरता कम नहीं होती
हर बड़े जनांदोलन के साथ राजनीतिक दलों और विभिन्न संगठनों के जुड़ने की संभावना रहती है। CJP के प्रदर्शन को भी विपक्षी दलों और किसान संगठनों का समर्थन मिला है। लेकिन किसी आंदोलन के राजनीतिक रंग लेने से उसके मूल मुद्दे स्वतः समाप्त नहीं हो जाते। एक परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवस्था का दायित्व यह नहीं कि वह केवल समर्थन करने वालों की मंशा पर सवाल उठाए, बल्कि यह है कि उठाए गए मुद्दों की वास्तविकता और गंभीरता का निष्पक्ष मूल्यांकन करे।
आंदोलनकारियों की भी समान जिम्मेदारी
जितनी जिम्मेदारी सरकार की है, उतनी ही आंदोलन का नेतृत्व कर रहे युवाओं की भी है। किसी भी न्यायसंगत मांग की नैतिक शक्ति हिंसा, तोड़फोड़ या उपद्रव से कमजोर पड़ जाती है। चाणक्य नीति भी दंड के सिद्धांत को व्यक्ति विशेष के अपराध तक सीमित रखने की बात करती है, पूरे समुदाय को दोषी ठहराने की नहीं। यदि कोई कानून तोड़ता है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन कुछ लोगों की हरकतों के आधार पर पूरी युवा पीढ़ी को ‘उपद्रवी’ या ‘राष्ट्रविरोधी’ कहना भी न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

भरोसे की पुनर्स्थापना ही सबसे बड़ी जरूरत
आज युवाओं का यह आक्रोश केवल शासन के लिए चुनौती नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सुधार का अवसर भी है। ऐसी परीक्षा व्यवस्था विकसित करना समय की मांग है, जिसमें हर छात्र को समान, निष्पक्ष और पारदर्शी अवसर मिल सके। इस लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है। इसके लिए सरकार और युवाओं—दोनों को संवाद, पारदर्शिता और आपसी विश्वास के साथ आगे बढ़ना होगा। यही किसी भी मजबूत लोकतंत्र और उत्तरदायी शासन की सबसे बड़ी पहचान है।





































