NEW DELHI.सुबह की चाय में इस्तेमाल होने वाली चीनी, खाने का नमक और सांस के साथ शरीर में जाने वाली हवा भी माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क का माध्यम बन सकती है। प्लास्टिक के ये बेहद छोटे कण सामान्य आंखों से दिखाई नहीं देते। वैज्ञानिक शोधों में नमक-चीनी से लेकर इंसानी खून और फेफड़ों तक में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी सामने आई है। हालांकि, अलग-अलग माध्यमों में इनकी पहचान और मात्रा का सटीक आकलन करने के लिए एकसमान जांच पद्धति विकसित करना अब भी बड़ी चुनौती है।
इस चुनौती से निपटने के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) से प्रगति रिपोर्ट मांगी है। मामले की सुनवाई के दौरान CPCB ने बताया कि विभिन्न माध्यमों में माइक्रोप्लास्टिक की जांच के लिए विस्तृत प्रक्रियाएं विकसित करने और उनका मानकीकरण करने में करीब 12 महीने लगने का अनुमान है।
माइक्रोप्लास्टिक की जांच के लिए क्या है चुनौती?
शुक्रवार को न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की पीठ ने नमक-चीनी के ब्रांडों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी और इंसानी खून में इसकी पहचान से जुड़े मामलों की सुनवाई की। इस दौरान CPCB ने 13 अक्टूबर 2026 की अपनी प्रगति रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय मानक IS 18998:2025 पर्यावरण में माइक्रोप्लास्टिक के विश्लेषण के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत उपलब्ध कराता है। हालांकि, पानी, मिट्टी, अवसाद, हवा, कीचड़ और जैविक नमूनों में इसकी जांच के लिए माध्यम के अनुसार विस्तृत प्रक्रियाएं निर्धारित नहीं हैं। यही वजह है कि अलग-अलग प्रकार के नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक की पहचान, विश्लेषण और मात्रा का आकलन करने के लिए स्पष्ट एवं मानकीकृत जांच पद्धतियां विकसित करने की जरूरत है।
मिट्टी और मीठे पानी की जांच करेगा CIPET
CPCB की रिपोर्ट के अनुसार, मीठे पानी और मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक की जांच की पद्धति विकसित करने के लिए सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (CIPET) ने सहमति दी है। वहीं, समुद्री जल, तटीय अवसाद, कीचड़ और जैविक नमूनों की जांच के लिए नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट (NCSCM) काम करेगा। इन संस्थानों की मदद से संबंधित नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक की पहचान के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं विकसित की जाएंगी।
हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक की जांच की जिम्मेदारी NEERI को
हवा के नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक की पहचान के लिए जांच पद्धति विकसित करने की जिम्मेदारी CSIR-नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) को दी जानी है। इन अलग-अलग संस्थानों के काम का उद्देश्य ऐसी प्रक्रियाएं तैयार करना है, जिनसे विभिन्न माध्यमों में माइक्रोप्लास्टिक की जांच अधिक व्यवस्थित और तुलनीय तरीके से की जा सके। इसके बाद इन पद्धतियों के मानकीकरण और प्रयोगशालाओं में सत्यापन की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
जांच के लिए मानक बनने से क्या होगा फायदा?
अलग-अलग प्रयोगशालाओं में अलग-अलग तरीके अपनाए जाने से माइक्रोप्लास्टिक की पहचान और उसकी मात्रा के परिणामों की तुलना करना मुश्किल हो सकता है। मानकीकृत जांच पद्धतियां तैयार होने से नमक, चीनी, पानी, हवा, मिट्टी और जैविक नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक के आकलन को अधिक विश्वसनीय बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी सामने आने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि किसी विशेष खाद्य पदार्थ या संपर्क से बीमारी होना साबित हो गया है। इसके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को समझने के लिए आगे भी वैज्ञानिक शोध और प्रमाणों की जरूरत है।

































