WASHINGTON NEWS. अमेरिका की सीनेट में ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करने की कोशिश फिलहाल सफल नहीं हो सकी। गुरुवार को हुई वोटिंग में यह प्रस्ताव 49-50 के अंतर से आगे नहीं बढ़ पाया। इसके चलते राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को ईरान के खिलाफ सैन्य फैसलों पर तत्काल संसदीय बाध्यता से राहत मिल गई है। यह प्रस्ताव अभी सीनेट की विदेश मामलों से जुड़ी समिति में लंबित है। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसद चाहते थे कि इसे पूरी सीनेट में बहस और मतदान के लिए लाया जाए, लेकिन आवश्यक समर्थन नहीं मिलने से यह प्रक्रिया फिलहाल रुक गई।

अब इसे दोबारा सदन में लाने के लिए नए सिरे से प्रयास करने होंगे। यदि यह प्रस्ताव पारित हो जाता, तो ईरान के खिलाफ किसी नए सैन्य अभियान से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए संसद की मंजूरी लेना अनिवार्य हो जाता। विपक्षी सांसद ट्रम्प प्रशासन के हालिया सैन्य अभियानों के बाद लगातार मांग कर रहे हैं कि युद्ध जैसे बड़े फैसलों पर कांग्रेस की भूमिका सुनिश्चित की जाए।

इधर पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। युद्ध के बीच पहली बार मिस्र के एक बंदरगाह पर ड्रोन हमला हुआ, जिसमें दो जहाजों में आग लग गई। इस हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार माना जा रहा है। उधर अमेरिकी सेना ने ईरान के कई शहरों और रणनीतिक ठिकानों पर बड़े हवाई हमले किए। बंदर अब्बास, किश और क़ेश्म द्वीप से विस्फोटों की खबरें सामने आई हैं।

इसके जवाब में ईरान की रिवोल्यूशनरी फोर्स ने दावा किया कि उसने कुवैत और जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। कुवैत में एक चीनी कंपनी की इमारत भी हमले की चपेट में आई, जिसमें एक कर्मचारी की मौत हो गई। वहीं लाल सागर में समुद्री सुरक्षा को लेकर सऊदी अरब एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की तैयारी कर रहा है। बताया जा रहा है कि अब तक 14 देशों ने इसमें शामिल होने की इच्छा जताई है।

इस बीच ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने क़ेश्म द्वीप पर नागरिकों की मौत के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि वॉशिंगटन को इसकी कीमत चुकानी होगी। वहीं ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने चेतावनी दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहेगा और अमेरिकी हमलों का जवाब जल्द दिया जाएगा।






































