NEW DELHI NEWS. अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने की तैयारी कर रहे भारतीय छात्रों के लिए 2025 का एडमिशन सीजन उम्मीदों के विपरीत रहा। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान भारतीय छात्रों को मिलने वाले F-1 स्टूडेंट वीजा में रिकॉर्ड स्तर की गिरावट दर्ज की गई है। खास बात यह है कि यह कमी चीन की तुलना में कहीं अधिक रही। अमेरिका स्थित सेंटर फॉर इमिग्रेशन स्टडीज (CIS) के विश्लेषण के अनुसार, मई से अगस्त 2025 के बीच भारतीय नागरिकों को केवल 22,149 F-1 स्टूडेंट वीजा जारी किए गए। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह संख्या 58,694 थी। यानी एक साल में करीब 62 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई।

2025 के एडमिशन सीजन में भारतीय छात्रों को जारी हुए सिर्फ 22,149 F-1 वीजा, चीन के मुकाबले कहीं अधिक रही गिरावट। रिपोर्ट में भविष्य के एडमिशन और वर्कफोर्स पर असर की आशंका जताई गई। रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी छात्रों को जारी किए जाने वाले F-1 वीजा की संख्या भी घटी है। मई-अगस्त 2024 में जहां 61,075 चीनी छात्रों को वीजा मिला था, वहीं 2025 में यह आंकड़ा घटकर 40,034 रह गया। यह करीब 34 प्रतिशत की कमी है, जो भारत के मुकाबले काफी कम है।

मई से अगस्त का समय अमेरिकी विश्वविद्यालयों के नए शैक्षणिक सत्र से पहले का सबसे व्यस्त वीजा सीजन माना जाता है। अधिकांश अंतरराष्ट्रीय छात्रों को इसी अवधि में स्टूडेंट वीजा जारी किया जाता है, इसलिए इस दौरान आई गिरावट को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन (IIE) के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 शैक्षणिक वर्ष में अमेरिका के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में 3,63,019 भारतीय छात्रों ने दाखिला लिया। वहीं 2,65,919 छात्रों के साथ चीन दूसरे स्थान पर रहा।

11.7 लाख विदेशी छात्रों में आधे भारत और चीन से
अमेरिका के उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ रहे लगभग 11.7 लाख अंतरराष्ट्रीय छात्रों में आधे से अधिक भारत और चीन से आते हैं। ऐसे में वीजा जारी होने में आई यह गिरावट भविष्य के एडमिशन, अमेरिकी वर्कफोर्स में शामिल होने वाले अंतरराष्ट्रीय ग्रेजुएट्स और इमिग्रेशन नीति पर असर डाल सकती है।

ऐतिहासिक औसत से भी काफी नीचे पहुंचा आंकड़ा
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2020 के कोविड काल को छोड़ दें तो 2017-19 और 2021-24 के बीच मई से अगस्त की अवधि में भारतीय छात्रों को औसतन 55,717 F-1 वीजा जारी किए जाते थे। इसके मुकाबले 2025 का आंकड़ा लगभग 60 प्रतिशत कम है। इससे संकेत मिलता है कि यह गिरावट केवल पिछले साल की तुलना तक सीमित नहीं, बल्कि लंबे समय के औसत से भी काफी नीचे है।





































