NEW DELH NEWS. विदेशी धरती पर पढ़ाई कर शानदार करियर बनाने का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों की प्राथमिकताओं में एक बड़ा ‘यू-टर्न’ देखने को मिल रहा है। कभी भारतीय युवाओं की पहली पसंद रहने वाला अमेरिका अब अपना आकर्षण खोता जा रहा है। कड़े वीसा नियम, इंटरव्यू के लिए महीनों का इंतजार और पढ़ाई के बाद नौकरी मिलने में आ रही दिक्कतों के कारण हजारों भारतीय छात्र अब अमेरिका के बजाय यूरोपीय देशों का रुख कर रहे हैं। यूएस स्टडी डेटा के ताजा आंकड़ों (जून, 2026) के मुताबिक, अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या में भारी गिरावट आई है।

पिछले साल जहां अमेरिका में 3 लाख 82 हजार भारतीय छात्र पढ़ रहे थे, वहीं इस साल यह संख्या घटकर 3 लाख 52 हजार रह गई है। रिपोर्ट के अनुसार, बीते एक साल में करीब 30 हजार छात्रों ने अमेरिका में अपना कोर्स पूरा होने से पहले ही यूनिवर्सिटी छोड़ दी और यूरोपीय देशों का रुख कर लिया। अमेरिकी एजुकेशन काउंसलर्स ने अंदेशा जताया है कि अगर यही स्थिति रही, तो अगले एक साल के भीतर करीब 70 हजार और भारतीय छात्र अमेरिका छोड़ सकते हैं।

क्यों फीकी पड़ी अमेरिका की चमक?
जानकारों के मुताबिक, अमेरिका में सत्ता परिवर्तन (ट्रम्प प्रशासन) के बाद से नियमों में काफी सख्ती आई है। भारत में अमेरिकी दूतावास और काउंसलर ऑफिसों में छात्रों को इंटरव्यू की डेट ही नहीं मिल पा रही है। स्थिति यह है कि वीसा इंटरव्यू के लिए छात्रों को 10 से 11 महीने तक का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। इसके अलावा, पढ़ाई के बाद मिलने वाले 2 साल के वर्क परमिट (OPT) को लेकर बनी अनिश्चितता ने छात्रों को दूसरे विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है।

यूरोप बना ‘नया ठिकाना’: फीस भी माफ, जॉब की भी गारंटी
अमेरिका की तुलना में जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और नीदरलैंड्स जैसे यूरोपीय देश भारतीय छात्रों का दिल जीत रहे हैं। इसकी मुख्य वजहें निम्नलिखित हैं:
करियर और वीसा की गारंटी: यूरोपीय देश न सिर्फ आसानी से वीसा दे रहे हैं, बल्कि पढ़ाई खत्म होने के बाद 2 साल तक जॉब करने की कानूनी मंजूरी भी दे रहे हैं।
मुफ्त शिक्षा (फ्री एजुकेशन): जर्मनी, फ्रांस और नीदरलैंड्स की सरकारी यूनिवर्सिटीज में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए ट्यूशन फीस पूरी तरह माफ या बेहद मामूली है।
कम लागत: अमेरिका के मुकाबले यूरोप में रहने और खाने-पीने का खर्च काफी कम है।

जर्मनी में भारतीयों का दबदबा, कनाडा का ग्राफ गिरा
वैश्विक स्तर पर छात्रों के इस पलायन ने आंकड़ों को पूरी तरह बदल कर रख दिया है-
जर्मनी में नंबर-1 बने भारतीय: साल 2023 में जहां जर्मनी में 28,905 भारतीय छात्र थे, वहीं 2026 में यह आंकड़ा दोगुने से अधिक बढ़कर 59,400 तक पहुंच गया है। इसके साथ ही चीनी छात्रों को पीछे छोड़ते हुए भारतीय अब जर्मनी में विदेशी छात्रों का सबसे बड़ा समूह बन गए हैं।
कनाडा से भी मोहभंग: सिर्फ अमेरिका ही नहीं, कनाडा का आकर्षण भी तेजी से खत्म हुआ है। सख्त नियमों के कारण इस साल कनाडा जाने वाले अंतरराष्ट्रीय स्टूडेंट्स में 60% की भारी कमी आई है। पीएम कार्नी के अनुसार, 2023 में कुल विदेशी छात्रों में भारतीय छात्रों की हिस्सेदारी 52% थी, जो अब घटकर महज 8% पर सिमट गई है।






































