ORAI/JALAUN NEWS. लगातार बदलते मौसम, घटते भूजल स्तर और रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से बंजर होती जमीन के बीच बुंदेलखंड के किसानों के लिए ‘प्राकृतिक खेती’ (Natural Farming) एक नई उम्मीद बनकर उभरी है। उत्तर प्रदेश के जालौन, झांसी और ललितपुर जैसे जिलों में मिट्टी की खास प्रकृति को देखते हुए अगर पारंपरिक और प्राकृतिक तरीकों को अपनाया जाए, तो न सिर्फ लागत शून्य होगी बल्कि पैदावार भी बंपर मिलेगी।
इसी कड़ी में कृषि विभाग के मार्गदर्शन में जमीनी स्तर पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और सफल किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

उरई तहसील प्रांगण में किसान समागम, 25 प्रगतिशील किसान सम्मानित
18 जून को उरई तहसील प्रांगण में प्राकृतिक खेती को समर्पित एक विशाल किसान जागरूकता एवं सम्मान समारोह संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में जिले भर से आए लगभग 1000 किसानों ने हिस्सा लिया।
जिलाधिकारी ने थपथपाई पीठ, इनको मिला सम्मान
माननीय जिलाधिकारी राजेश पांडे जी की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में प्राकृतिक और नवोन्मेषी खेती करने वाले 25 चुनिंदा किसानों को सम्मानित किया गया। इनमें प्रमुख रूप से शामिल रहे:
- लक्ष्मी नारायण चतुर्वेदी (सालाबाद): इन्हें प्राकृतिक पद्धति से खेती करने के साथ-साथ ‘चंदन की खेती’ जैसा अनूठा और बेहद मुनाफेदार प्रयोग करने के लिए विशेष रूप से सराहा गया।
- शिव शंकर चतुर्वेदी (कोकरगांव): इन्होंने एक साथ पांच तरह की फसलें (मिश्रित/सह-फसली खेती) उगाकर कृषि क्षेत्र में बेहतरीन मॉडल पेश किया।
- अन्य सम्मानित किसान: बैरागढ़ से बृजेश त्रिपाठी, इटोरा से वीरेंद्र पांडे, राम सिंह पटेल और हरदोई गुर्जर से अरुण सिंह गुर्जर सहित कई प्रगतिशील किसानों को मंच पर सम्मानित कर उनका हौसला बढ़ाया गया।
कार्यक्रम में मौजूद रहे वरिष्ठ अधिकारी व जनप्रतिनिधि
उपनिदेशक कृषि के कुशल मार्गदर्शन में संपन्न हुए इस भव्य कार्यक्रम में एडीएम नमामि गंगे, सिटी मजिस्ट्रेट, भाजपा की जिलाध्यक्ष उर्विजा दीक्षित, गौ सेवा आयोग के सदस्य राजेश सिंह सेंगर, मुख्य विकास अधिकारी कुमारेंद्र कलाकार सिंह, परियोजना निदेशक अखिलेश तिवारी, और डीपीआरओ सहित कृषि व विकास भवन के तमाम आला अधिकारी मौजूद रहे। इसके साथ ही किसान संघ के प्रांतीय अध्यक्ष साहब सिंह चौहान ने भी कार्यक्रम में शिरकत कर किसानों का मार्गदर्शन किया।
प्राकृतिक खेती के मुख्य फायदे: बुंदेलखंड के लिए क्यों है जरूरी?
रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बिना, पूरी तरह प्रकृति के नियमों के अनुसार की जाने वाली खेती को प्राकृतिक खेती कहते हैं। इसके मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:
- शून्य या बेहद कम लागत: इसमें बाजार से महंगे यूरिया, डीएपी या कीटनाशक खरीदने की जरूरत नहीं होती। जीवामृत, घनजीवामृत और नीमास्त्र जैसी खादें घर पर गाय के गोबर और गोमूत्र से तैयार होती हैं।
- पानी की कम खपत (मल्चिंग तकनीक): बुंदेलखंड में पानी की भारी किल्लत रहती है। प्राकृतिक खेती में ‘आच्छादन’ (मल्चिंग) यानी जमीन को फसल के अवशेषों से ढकने पर जोर दिया जाता है, जिससे नमी लंबे समय तक बनी रहती है और 50 से 60 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है।
- मिट्टी की सेहत में सुधार: केंचुओं और सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या बढ़ने से मिट्टी भुरभुरी और उपजाऊ बनती है।
- स्वास्थ्य के लिए अमृत: इस पद्धति से उपजा अनाज, फल और सब्जियां पूरी तरह केमिकल-फ्री होती हैं, जिससे गंभीर बीमारियों का खतरा टल जाता है।
जालौन, झांसी और ललितपुर की मिट्टी की प्रकृति और फायदेमंद फसलें
बुंदेलखंड के इन तीनों जिलों की मिट्टी की बनावट अलग-अलग है। मिट्टी के मिजाज को समझकर यदि प्राकृतिक तरीके से फसलें चुनी जाएं, तो किसानों की आय दोगुनी होना तय है:
1. जालौन (काबर और मार मिट्टी का क्षेत्र)
जालौन के अधिकांश हिस्सों में काली मिट्टी (मार और काबर) पाई जाती है, जिसमें जलधारण क्षमता अधिक होती है लेकिन सूखने पर यह बेहद सख्त हो जाती है।
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फायदेमंद फसलें: प्राकृतिक विधि से यहाँ चना, मटर, मसूर और गेहूं की खेती बेहद सफल है। इसके अलावा औषधीय पौधे और कम पानी वाली तिलहन फसलों (जैसे राई और सरसों) से किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
2. झांसी (पड़वा और राकर मिट्टी का क्षेत्र)
झांसी जिले में लाल और दोमट मिट्टी का मिश्रण (पड़वा और राकर) अधिक देखने को मिलता है। यह मिट्टी उथली और कम उपजाऊ मानी जाती है, जहाँ पानी आसानी से बह जाता है।
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फायदेमंद फसलें: इस मिट्टी के लिए मोटे अनाज (मिलेट्स) जैसे ज्वार, बाजरा, रागी और कोदो वरदान हैं। प्राकृतिक तरीके से यहाँ अरहर (तुअर), मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाकर बेहतरीन पैदावार देती हैं। मूंगफली की खेती भी यहाँ काफी मुनाफेदार साबित हो रही है।
3. ललितपुर (लाल रेतीली और पथरीली मिट्टी)
ललितपुर का क्षेत्र पठारी और पहाड़ी ढलानों से घिरा है। यहाँ लाल रेतीली मिट्टी की अधिकता है, जिसमें पोषक तत्वों की कमी होती है।
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फायदेमंद फसलें: यहाँ पारंपरिक फसलों के साथ-साथ बागवानी और वानिकी (Agroforestry) को प्राकृतिक तरीके से बढ़ावा देना सबसे बेस्ट है। सालाबाद के किसान लक्ष्मी नारायण चतुर्वेदी की तरह यहाँ चंदन की खेती, अमरूद, आंवला, और नींबू के बाग लगाना बेहद फायदेमंद है। फसलों में तिल, सोयाबीन, उड़द और अलसी जैसी कम पानी और कम लागत वाली फसलें सबसे उपयुक्त हैं।
उरई में आयोजित हुए इस किसान सम्मेलन ने यह साफ कर दिया है कि प्रशासन और सरकार अब पूरी तरह से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के मूड में है। यदि जालौन, झांसी और ललितपुर के किसान अपनी मिट्टी के मिजाज को पहचानकर गाय आधारित इस प्राकृतिक कृषि को अपनाते हैं, तो बुंदेलखंड की धरती सोना उगलने लगेगी।


































