BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में जारी उस विवादास्पद सर्कुलर पर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है, जिसमें जजों के सुनवाई से अलग होने (Recusal) को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि इस सर्कुलर का उद्देश्य केवल ‘बेंच हंटिंग’ (अपनी पसंद की बेंच चुनना) की प्रवृत्ति को रोकना और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना है, न कि अदालत के कामकाज में किसी तरह का हस्तक्षेप करना।

क्या है पूरा मामला?
बीते सप्ताह रजिस्ट्रार (जुडिशियल) द्वारा एक सर्कुलर जारी किया गया था, जिस पर हाईकोर्ट की एक अन्य डिवीजन बेंच (जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास) ने कड़ी आपत्ति जताई थी। उस बेंच ने इसे ‘अदालत की स्वतंत्रता में दखल’ करार दिया था।

दरअसल, यह विवाद तब शुरू हुआ जब एक वैवाहिक अपील की सुनवाई के दौरान बेंच के एक सदस्य ने खुद को इसलिए अलग कर लिया क्योंकि मामले में पैरवी कर रही जूनियर वकील उनकी करीबी रिश्तेदार (भतीजी) थीं। बेंच ने तब टिप्पणी की थी कि सर्कुलर जजों को उनके विशेषाधिकार के इस्तेमाल से रोकता है।
चीफ जस्टिस की बेंच का स्पष्टीकरण
29 अप्रैल और 3 मई को हुई सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने सर्कुलर की मंशा साफ करते हुए कहा:
बेंच हंटिंग पर रोक: सर्कुलर का मुख्य उद्देश्य उन पक्षकारों को रोकना है जो जानबूझकर अपने मामले को किसी विशेष जज या बेंच के सामने लगवाने का प्रयास करते हैं।
हस्तक्षेप नहीं, केवल ‘नोट ऑफ कॉशन’: कोर्ट ने कहा कि यह नियम किसी जज को हटने के लिए मजबूर नहीं करता, बल्कि यह केवल सतर्क रहने के लिए एक ‘नोट ऑफ कॉशन’ (सावधानी की सूचना) है।
न्यायिक अनुशासन: कोर्ट को यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वह अनजाने में किसी निहित स्वार्थ वाले पक्षकार का हथियार न बन जाए।

सर्कुलर के मुख्य बिंदु
सर्कुलर में मूल रूप से कहा गया है कि किसी बेंच या कोर्ट द्वारा सुनवाई से हटने को सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए। इसका सहारा केवल दुर्लभ और वास्तविक परिस्थितियों में ही लिया जाना चाहिए। यदि कोई वकील किसी जज से रिश्तेदारी होने के बावजूद केस स्वीकार करता है, तो इसे अनिवार्य रूप से हटने का आधार नहीं माना जाएगा। विशेष परिस्थितियों में जज को लिखित रूप में कारण दर्ज करने होंगे।

क्या होती है ‘बेंच हंटिंग’?
यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पक्षकार या वकील विभिन्न कानूनी दांव-पेंचों के जरिए यह कोशिश करते हैं कि उनका मामला उनकी पसंद के जज के पास जाए, जिससे उन्हें अनुकूल फैसला मिलने की उम्मीद हो। हाईकोर्ट ने इसे न्याय व्यवस्था के लिए खतरा मानते हुए आगाह किया है।






































