JHANSI NEWS. नवरात्रि का पर्व नजदीक आते ही झांसी में मां दुर्गा की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम तेज हो गया है। शहर के फूटा चौपड़ा स्थित कालीबाड़ी इलाके में इन दिनों मिट्टी, रंग और शिल्पकारी के बीच एक ऐसी कहानी आकार ले रही है, जो झांसी की गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की खूबसूरत तस्वीर पेश करती है।
कालीबाड़ी क्षेत्र में मुस्लिम शिल्पकार अब्दुल खलील अपने हाथों से मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं। उनके हाथों में मिट्टी धीरे-धीरे देवी के स्वरूप में ढलती है। चेहरे पर मुस्कान, आंखों में भाव और प्रतिमा में जीवंतता लाने के बाद यही मिट्टी की मूर्ति कुछ समय में मां दुर्गा के भव्य स्वरूप में नजर आने लगती है। अब्दुल खलील के लिए मूर्ति बनाना सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं है। यह उनके परिवार से मिली ऐसी विरासत है, जिसे वह करीब 26 वर्षों से आगे बढ़ा रहे हैं।
13 साल की उम्र में पिता से सीखा मूर्ति बनाने का हुनर
अब्दुल खलील ने महज 13 साल की उम्र में अपने पिता अब्दुल खालिद के साथ रहकर मूर्तियां बनाने की बारीकियां सीखनी शुरू कर दी थीं। उनके पिता करीब 45 वर्षों तक देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करते रहे। घर में पिता को मूर्तियां बनाते देखते-देखते खलील की भी इस कला में रुचि बढ़ती गई। धीरे-धीरे मिट्टी को आकार देने का हुनर उनकी पहचान बन गया।
खलील बताते हैं कि उन्होंने मूर्तिकला की कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं ली। उनके पिता ही उनके गुरु रहे और घर ही उनकी पहली कार्यशाला बना। मिट्टी तैयार करने से लेकर प्रतिमा का ढांचा बनाने, चेहरे के भाव उकेरने, रंग भरने और अंतिम सजावट तक की बारीकियां उन्होंने पिता के साथ काम करते हुए सीखीं। वर्ष 2012 में पिता के निधन के बाद भी उन्होंने इस पारिवारिक परंपरा को जारी रखा।
झांसी के प्रमुख पंडालों के लिए बनाते हैं प्रतिमाएं
अब्दुल खलील के हाथों तैयार होने वाली मां दुर्गा की प्रतिमाओं की झांसी में लंबे समय से मांग रही है। वह शहर के कई प्रमुख स्थानों और पंडालों के लिए प्रतिमाएं तैयार करते हैं। इनमें कालीबाड़ी, दयासागर कंपाउंड, इलाइट चौराहा, बड़ा बाजार और बड़ा मठ समेत कई स्थान शामिल हैं।खलील के मुताबिक, बंगाली समाज की कालीबाड़ी से जुड़ी करीब 168 वर्ष पुरानी परंपरा के लिए मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार करने का अवसर भी उन्हें मिलता है। उनके लिए हर प्रतिमा सिर्फ एक ऑर्डर नहीं होती। वह इसे वर्षों से लोगों की ओर से मिले भरोसे और सम्मान से जोड़कर देखते हैं।
मिट्टी से तैयार होती है प्रतिमा, चेहरे पर खास ध्यान
अब्दुल खलील प्रतिमाओं के निर्माण में मिट्टी का इस्तेमाल करते हैं। उनका प्रयास रहता है कि प्रतिमाओं में प्राकृतिक सामग्री और पर्यावरण के अनुकूल रंगों का अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जाए।उनके अनुसार, प्रतिमा बनाते समय उसके स्वरूप के साथ पर्यावरण का भी ध्यान रखना जरूरी है, ताकि विसर्जन के बाद पानी और आसपास के वातावरण पर कम से कम प्रभाव पड़े। प्रतिमा के चेहरे को जीवंत बनाना उनके काम का सबसे अहम हिस्सा है। आंखों की बनावट, चेहरे की मुस्कान और भाव-भंगिमा पर वह विशेष ध्यान देते हैं। यही वजह है कि प्रतिमा पूरी होने के बाद उसमें एक अलग तरह की जीवंतता नजर आती है।
तय कीमत नहीं, श्रद्धा से मिलने वाली राशि स्वीकार
खलील बताते हैं कि वह मूर्ति बनाने के लिए हमेशा कोई निश्चित कीमत तय नहीं करते। प्रतिमा तैयार होने के बाद लोग अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार जो राशि देते हैं, वह उसे स्वीकार कर लेते हैं।उनके लिए मूर्ति निर्माण केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि पिता से मिली शिक्षा और वर्षों से लोगों के मिले भरोसे से जुड़ा काम है। वह बताते हैं कि मूर्तियां बनाने के दौरान उनके परिवार को बंगाली समाज और अन्य लोगों का लगातार सहयोग और स्नेह मिलता रहा है।
धर्म अलग, लेकिन कला ने जोड़ा रिश्ता
अब्दुल खलील मुस्लिम समुदाय से आते हैं, लेकिन वर्षों से उनके हाथों मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार होती रही हैं। उनका कहना है कि इस काम को लेकर उन्हें कभी समाज के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। इसके उलट लोगों ने उन्हें सम्मान और सहयोग दिया। उनके हाथों तैयार प्रतिमाएं नवरात्रि के दौरान पंडालों में स्थापित होती हैं, जहां श्रद्धालु नौ दिनों तक विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा करते हैं।खलील के लिए यह लोगों के भरोसे और उनके हुनर के सम्मान की बात है। झांसी की यह तस्वीर बताती है कि अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग एक-दूसरे की परंपराओं और हुनर का सम्मान करते हुए साथ आगे बढ़ सकते हैं।
पिता की विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प
करीब 26 वर्षों से मूर्तियां बना रहे अब्दुल खलील आज अपने पिता की उस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसकी शुरुआत उनके परिवार में कई दशक पहले हुई थी। उनके लिए हर प्रतिमा के पीछे सिर्फ मिट्टी और रंग नहीं, बल्कि वर्षों का अनुभव, मेहनत और पिता से मिली सीख जुड़ी है।नवरात्रि में जब इन्हीं प्रतिमाओं के सामने हजारों श्रद्धालु सिर झुकाएंगे, तब शायद बहुत कम लोग जान पाएंगे कि मां दुर्गा के उस स्वरूप को आकार देने वाले हाथों के पीछे भी एक लंबी कहानी है।
अब्दुल खलील की कहानी इस मायने में खास है कि यहां हुनर ने धर्म की सीमाओं से आगे जाकर लोगों को जोड़ा है। पिता से मिली कला को उन्होंने अपने जीवन का हिस्सा बनाया और आज उसी के जरिए झांसी की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। मिट्टी से तैयार होती मां दुर्गा की ये प्रतिमाएं अब्दुल खलील के लिए सिर्फ शिल्प नहीं, बल्कि मेहनत, भरोसे, विरासत और आपसी सम्मान की पहचान भी हैं।





































