BILASPUR NEWS. लोक अदालत में बिना पक्षकारों की सहमति के किसी विवाद का एकतरफा निपटारा नहीं किया जा सकता। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि लोक अदालत की भूमिका आपसी सहमति और समझौते के आधार पर विवाद खत्म करने तक सीमित है। वह किसी मामले के गुण-दोष पर फैसला सुनाकर किसी पक्ष को दायित्व से मुक्त नहीं कर सकती। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने इसी आधार पर वर्ष 2014 में लोक अदालत द्वारा पारित अवार्ड को निरस्त कर दिया।

करंट की चपेट में आकर हुई थी युवक की मौत
मामला छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल (CSPDCL) से जुड़ा है। बिजली मेंटेनेंस का काम ठेकेदार अभिनव तिवारी को दिया गया था। ठेकेदार ने छोटू उर्फ शत्रुहन नाम के युवक को काम पर रखा था। वर्ष 2012-13 में काम के दौरान करंट की चपेट में आने से युवक की मौत हो गई। इसके बाद मृतक के परिजनों ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत लेबर कोर्ट में 9 लाख 880 रुपये के मुआवजे का दावा किया। CSPDCL ने यह राशि कोर्ट में जमा भी करा दी थी।

जिम्मेदारी को लेकर फंसा था विवाद
मामले में CSPDCL का कहना था कि मुआवजे की वास्तविक जिम्मेदारी ठेकेदार की है, इसलिए जमा की गई राशि उससे वसूल की जानी चाहिए। दूसरी ओर ठेकेदार ने मृतक युवक को अपना कर्मचारी मानने से ही इनकार कर दिया। इसी मुद्दे को लेकर मामला लेबर कोर्ट में लंबित था।
लोक अदालत में बिना सहमति बंद कर दिया गया मामला
मामले के लंबित रहने के दौरान ठेकेदार इसे लोक अदालत में ले गया। 6 दिसंबर 2014 को लोक अदालत ने बिना किसी आपसी समझौते के मामले का निपटारा कर दिया और ठेकेदार को मुआवजे की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। CSPDCL ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट ने कहा- समझौता नहीं तो अवार्ड भी नहीं
हाईकोर्ट ने CSPDCL की अपील स्वीकार करते हुए लोक अदालत के वर्ष 2014 के अवार्ड को रद्द कर दिया। कोर्ट ने साफ किया कि लोक अदालत तभी विवाद का निपटारा कर सकती है, जब पक्षकारों के बीच सहमति या समझौता हो। किसी मामले की मेरिट पर फैसला सुनाना या एक पक्ष को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त करना लोक अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं है।
हाईकोर्ट ने मामले को दोबारा लेबर कोर्ट में भेजते हुए निर्देश दिया कि संबंधित अदालत कानून के अनुसार मामले की सुनवाई कर 5 महीने के भीतर निर्णय दे।







































