BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सिर्फ विवाहित होने के आधार पर बेटी को अनुकंपा नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने दो विवाहित बेटियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें 90 दिनों के भीतर अनुकंपा नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं।

शादी को बनाया नौकरी से इनकार का आधार
मामला छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक के दो दिवंगत कर्मचारियों मदन कुमार पांडा और शैलेंद्र कुमार जॉनसन से जुड़ा है। दोनों की सेवा अवधि के दौरान मृत्यु के बाद उनकी बेटियों अंकिता मिश्रा और शीना डेविड ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। बैंक ने दोनों के आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिए कि वे विवाहित हैं।
बैंक के इस फैसले को चुनौती देते हुए दोनों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, सिंगल बेंच ने 7 मई 2026 को उनकी याचिकाएं खारिज कर दी थीं। इसके बाद दोनों ने डिवीजन बेंच में रिट अपील दायर की।

बेटों को लाभ और बेटियों को वंचित करना गलत
डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि बैंक की योजना के तहत विवाहित बेटों को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ दिया जा रहा है, लेकिन विवाहित बेटियों को केवल शादीशुदा होने के आधार पर इससे बाहर किया जा रहा है। कोर्ट ने इसे संवैधानिक समानता के अधिकार के विपरीत माना।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल विवाह हो जाने से यह नहीं माना जा सकता कि बेटी की अपने माता-पिता पर आर्थिक या सामाजिक निर्भरता पूरी तरह समाप्त हो गई है। ऐसे मामलों में वास्तविक निर्भरता का आकलन किया जाना जरूरी है।

बैंक का आदेश और सिंगल बेंच का फैसला रद्द
डिवीजन बेंच ने बैंक द्वारा दोनों आवेदनों को खारिज करने के आदेश और सिंगल बेंच के पूर्व फैसले को निरस्त कर दिया। दोनों रिट अपीलों को मंजूर करते हुए कोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक को निर्देश दिया कि दोनों महिलाओं की शैक्षणिक योग्यता और लागू अनुकंपा नियुक्ति योजना के अनुसार उपयुक्त पद पर नियुक्ति की जाए।
कोर्ट ने साफ कहा कि वैवाहिक स्थिति को अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता। आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के बाद बैंक को दोनों अपीलकर्ताओं को 90 दिनों के भीतर नियुक्ति देने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

बेटियों के अधिकार पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
इस फैसले को अनुकंपा नियुक्ति में विवाहित बेटियों के अधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय के तौर पर देखा जा रहा है। कोर्ट के आदेश ने स्पष्ट कर दिया है कि अनुकंपा नियुक्ति में सिर्फ महिला के विवाहित होने के आधार पर उसके दावे को खारिज नहीं किया जा सकता; पात्रता और पारिवारिक निर्भरता का वास्तविक परीक्षण जरूरी होगा।





































