BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि महज संदेह, आशंका और अनुमान के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी करार नहीं दिया जा सकता। शक कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह कानूनी सबूत का विकल्प नहीं बन सकता। अदालत ने जांजगीर-चांपा की निचली अदालत का फैसला रद्द करते हुए उम्रकैद की सजा पाए आरोपी को बरी कर दिया।

मामला जांजगीर-चांपा जिले के खोखसा खार गांव का है। सितंबर 2014 में मुकेश यादव की डंडे से मारकर हत्या करने और शव को रेलवे लाइन के पास स्थित तालाब में फेंकने का आरोप बंशी यादव और उसके बेटे देवप्रकाश यादव पर लगाया गया था।
इस मामले में 10 अप्रैल 2015 को जांजगीर-चांपा के तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश ने बंशी यादव को दोषमुक्त कर दिया था, जबकि उसके बेटे देवप्रकाश यादव को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 201 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट में दी गई चुनौती
उम्रकैद की सजा के खिलाफ देवप्रकाश यादव ने अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला के माध्यम से हाईकोर्ट में अपील दायर की। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि हत्या की घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। मृतक के परिजनों ने केवल यह आशंका जताई थी कि वह आरोपी के घर गया था और उसके बाद वापस नहीं लौटा। अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ अपराध साबित करने के लिए ऐसे ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिनके आधार पर दोषसिद्धि कायम रखी जा सके।

‘संदेह सबूत का विकल्प नहीं’
हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को आरोप संदेह से परे साबित करना होता है। केवल परिस्थितियों से पैदा हुआ संदेह या अनुमान किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का आधार नहीं बन सकता।
पर्याप्त और पुख्ता साक्ष्य के अभाव में डिवीजन बेंच ने देवप्रकाश यादव की उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया और उसे सभी आरोपों से बरी करने का आदेश दिया।

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