WASHINGTON NEWS. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ को अचानक रोकने का फैसला केवल एक कूटनीतिक कदम नहीं, बल्कि जमीनी हालात से जुड़ा बड़ा संकेत भी माना जा रहा है। अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट में फंसे जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए यह ऑपरेशन शुरू किया था, लेकिन शुरुआत के महज दो दिनों के भीतर ही इसे रोक दिया गया। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि पाकिस्तान की अपील और ईरान के साथ संभावित समझौते की दिशा में बढ़ती बातचीत इस फैसले की मुख्य वजह है।

दरअसल, इस घटनाक्रम का विश्लेषण बताता है कि यह निर्णय केवल कूटनीतिक पहल का नतीजा नहीं था, बल्कि ऑपरेशन की सीमित सफलता और बढ़ते सैन्य तनाव भी इसके पीछे अहम कारण रहे। ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ अपने शुरुआती लक्ष्य में प्रभावी साबित नहीं हो सका। दो दिनों में अमेरिका केवल तीन जहाजों को ही सुरक्षित निकाल पाया, जबकि सामान्य परिस्थितियों में इस मार्ग से रोजाना करीब 130 जहाज गुजरते हैं।

इससे यह साफ होता है कि इतनी बड़ी सैन्य पहल के बावजूद समुद्री मार्ग को पूरी तरह सुरक्षित और सुचारु बनाना संभव नहीं हो सका। स्थिति और जटिल तब हो गई जब ऑपरेशन शुरू होते ही ईरान ने कड़ा रुख अपना लिया। उसने स्पष्ट कर दिया कि उसकी अनुमति के बिना कोई भी जहाज इस रास्ते से नहीं गुजर सकता। इसके बाद दक्षिण कोरिया के एक जहाज पर हमला और संयुक्त अरब अमीरात पर मिसाइल व ड्रोन हमलों ने पूरे क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया।

इससे यह संकेत मिला कि ऑपरेशन ने हालात को शांत करने के बजाय और अधिक अस्थिर बना दिया। इस बीच अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव लाकर ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने की कोशिश की, वहीं क्षेत्र में अपने युद्धपोतों की तैनाती भी जारी रखी। दूसरी ओर, चीन ने विदेशी प्रतिबंधों का पालन करने वाली कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई का कानून बनाकर इस संकट को वैश्विक आर्थिक आयाम दे दिया है।

तेहरान में भी माहौल केवल सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रहा। वहां लगाए गए पोस्टरों और बिलबोर्ड्स में ट्रम्प को कमजोर दिखाने की कोशिश की गई, जिससे यह साफ है कि यह संघर्ष अब मनोवैज्ञानिक और प्रचार युद्ध का रूप भी ले चुका है। इसी बीच इराक ने सस्ते दाम पर तेल देने का प्रस्ताव रखकर वैश्विक बाजार में हलचल मचा दी है। लगभग ₹3100 प्रति बैरल का यह ऑफर उस समय आया है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत करीब ₹11,000 प्रति बैरल के आसपास है। यह कदम क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और आर्थिक दबाव की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

हालांकि अमेरिका ने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के खत्म होने का दावा किया है, लेकिन जमीनी हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। मिसाइल हमले जारी हैं और होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने हैं। करीब 38 दिनों की लड़ाई और हजारों हमलों के बावजूद निर्णायक स्थिति सामने नहीं आई है। कुल मिलाकर, ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ को रोकने का फैसला यह दर्शाता है कि केवल सैन्य ताकत के दम पर इस संकट का समाधान संभव नहीं है।


































