BENGALORE. मुर्दों के साथ सेक्स करना रेप नहीं है। कानून की खामी का फायदा उठाते हुए एक दरिंदा इस संगीन और इंसानियत को शर्मसार करने वाली वारदात को अंजाम देने के बाद भी बच गया। कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी उसे बरी करने का फैसला सुना दिया। मगर, इसके साथ ही केंद्र को यह निर्देश दिया है कि इस कानून में बदलाव करे।
कानून के हिसाब से शव व्यक्ति नहीं है। दरअसल, एक आरोपी ने लड़की की हत्या के बाद उसके शव से रेप का जघन्य अपराध किया था। इस केस में निचली अदालत ने आरोपी को हत्या और रेप का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई और जुर्माना भी लगाया था। मगर, 8 साल बाद अब कर्नाटक हाई कोर्ट ने उसे हत्या का दोषी तो माना, लेकिन रेप के आरोप में बरी कर दिया।
धारा 377 में है यह खामी
आरोपी ने कानून में कमी का दांव खेला और इसकी वजह से बच निकला। हाई कोर्ट ने भी अपने आदेश में कहा कि कानून के हिसाब से शव को व्यक्ति नहीं माना जा सकता। लिहाजा, आरोपी पर रेप से जुड़ी आईपीसी की धारा 376 लागू नहीं होती। दरअसल, धारा 377 अप्राकृतिक सेक्स पर लागू होती है।

इस धारा के मुताबिक, प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ किसी भी पुरुष, महिला या जानवर के साथ सेक्स पर उम्रकैद या 10 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। मगर, इसमें शव के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। यानी शव को व्यक्ति माना जाए या नहीं, इस पर इस धारा में कुछ नहीं कहा गया है। साथ ही धारा 375 और 377 के तहत भी शव को मानव या व्यक्ति नहीं माना जा सकता।
6 महीने में धारा 377 में बदलाव करे केंद्र सरकार
इसके साथ ही कोर्ट ने 6 महीने के भीतर धारा 377 में बदलाव करने का निर्देश दिया है। केंद्र सरकार से कहा है कि वह नेक्रोफीलिया और शवों के साथ सेक्स को आईपीसी की धारा 377 के दायरे में लाए। साथ ही इस धारा में बदलाव करके मानव शव या जानवरों की लाश के साथ सेक्स पर सजा का प्रावधान करे।
30 मई को दिए फैसले में कोर्ट ने ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका का हवाला दिया। इन देशों में नेक्रोफीलिया या शव के साथ सेक्स आपराध माना जाता है और इसके तहत सजा दिए जाने का प्रावधान किया है। हाई कोर्ट ने कहा कि प्रकृति की व्यवस्थाओं के खिलाफ सेक्स पर आजीवन कारावास या 10 साल तक की सजा का प्रावधान होना चाहिए।

जानिए क्या है नेक्रोफीलिया?
शवों के प्रति सेक्सुअल आकर्षण को नेक्रोफीलिया कहते हैं। दरअसल, दो ग्रीक शब्दों नेक्रो यानी शव और फीलिया यानी आकर्षण से मिलाकर नेक्रोफीलिया शब्द बना है। यह एक तरह की मानसिक विकृति है, जिसमें मरे हुए लोगों के प्रति इस बीमारी के पीड़ित को आकर्षिण होता है और वह लाश के साथ सेक्स करता है। इससे पीड़ित लोग अक्सर सीरियल किलर बन जाते हैं। वह हत्या के बाद शव के साथ सेक्स करते हैं। नोएडा के चर्चित निठारी कांड में सुरेंद्र कोली भी नेक्रोफीलिया से पीड़ित था।
इन देशों में है सजा का प्रावधान
यूके: यूनाइटेड किंगडम में यौन अपराध अधिनियम 2003 की धारा 70 किसी व्यक्ति को अपराध मानती है, जो जानबूझकर या लापरवाही से अपने शरीर के किसी भी हिस्से को मृत व्यक्ति के किसी भी हिस्से में यौन रूप से प्रवेश करता है। उसी के लिए सजा 6 महीने से लेकर 2 साल तक की सजा का प्रावधान है।
कनाडा: कनाडा की आपराधिक संहिता, 1985 की धारा 182 नेक्रोफिलिया को दंडनीय बनाती है। इसके लिए पांच साल से अधिक की सजा नहीं है। कनाडा में कानून आईपीसी की धारा 297 की तरह का लगता है, लेकिन उसके समान नहीं है।
न्यूजीलैंड: अपराध अधिनियम, 1961 की धारा 150 किसी भी व्यक्ति को लाश से कोई भी खिलवाड़ करने पर दो साल के कैद की सजा देती है। चाहे वह लाश दफन हो या न हो। मगर, उसकी गरिमा को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए।
दक्षिण अफ्रीका: दक्षिण अफ्रीका में आपराधिक कानून (यौन अपराध और संबंधित मामले) संशोधन अधिनियम, 2007 की धारा 14 नेक्रोफीलिया पर रोक लगाती है।





































