BILASPUR NEWS. जमीन और संपत्ति विवाद में निर्माण कार्य रोकने को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तहसीलदार अथवा राजस्व अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर किसी संपत्ति पर निर्माण रोकने का आदेश नहीं दे सकते। हाईकोर्ट ने महासमुंद तहसीलदार द्वारा जारी निर्माण रोकने के अंतरिम आदेश को रद्द करते हुए उनके समक्ष चल रही पूरी कार्यवाही भी निरस्त कर दी।

रजिस्टर्ड सेल-डीड से खरीदी थी जमीन
मामले के अनुसार नीरज जैन और विकास चोपड़ा ने महासमुंद में खसरा नंबर 2052/1 और 2052/2 की जमीन रजिस्टर्ड सेल-डीड के जरिए खरीदी थी। जमीन पर उन्होंने निर्माण कार्य शुरू कराया। इसी दौरान पड़ोसी जगदीश प्रसाद अग्रवाल ने निर्माण पर आपत्ति जताते हुए तहसीलदार के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की और काम रुकवाने की मांग की।

शिकायत पर महासमुंद तहसीलदार ने 25 अप्रैल 2022 को निर्माण कार्य रोकने का अंतरिम आदेश जारी कर दिया। इसके बाद जमीन के खरीदार नीरज जैन ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
सिविल कोर्ट से राहत नहीं मिली तो तहसीलदार के पास पहुंचा मामला
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि इसी जमीन से जुड़े विवाद में जगदीश प्रसाद अग्रवाल पहले ही सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुके थे। हालांकि सिविल कोर्ट ने उन्हें स्थायी निषेधाज्ञा देने से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद निर्माण रोकने के लिए मामला तहसीलदार के समक्ष ले जाया गया।

हाईकोर्ट ने तय की राजस्व अधिकारियों की सीमा
जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद (एके प्रसाद) की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए राजस्व अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि राजस्व अधिकारियों की भूमिका मुख्य रूप से राजस्व एवं कृषि भूमि से जुड़े मामलों तक सीमित है। किसी संपत्ति पर निर्माण रोकने जैसी निषेधात्मक राहत देने का अधिकार सक्षम सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार में आता है।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर तहसीलदार के 25 अप्रैल 2022 के अंतरिम आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए रद्द कर दिया। साथ ही तहसीलदार के समक्ष इस मामले में चल रही पूरी कार्यवाही भी निरस्त कर दी।

फैसले से संपत्ति विवादों में महत्वपूर्ण कानूनी संदेश
हाईकोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि जमीन या संपत्ति को लेकर विवाद होने पर राजस्व अधिकारी और सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र अलग-अलग हैं। निर्माण रोकने या निषेधाज्ञा जैसी राहत के लिए सक्षम सिविल कोर्ट का रुख करना होगा।





































