RAIPUR NEWS. छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव से पहले राज्य सरकार ने कानूनी मोर्चे पर भी तैयारी शुरू कर दी है। दिसंबर 2026 और जनवरी 2027 में प्रस्तावित निकाय चुनाव को लेकर वार्ड परिसीमन और आरक्षण पर संभावित विवाद को देखते हुए सरकार ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में केविएट दाखिल की है।
सरकार की इस पहल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परिसीमन या आरक्षण से जुड़े किसी मामले में यदि कोई पक्ष हाईकोर्ट पहुंचकर अंतरिम राहत या रोक की मांग करता है, तो अदालत एकतरफा आदेश जारी करने से पहले राज्य सरकार का पक्ष भी सुने।

परिसीमन और आरक्षण पर विवाद की आशंका
निकाय चुनाव से पहले वार्डों की सीमाओं का निर्धारण और विभिन्न वर्गों के लिए सीटों का आरक्षण किया जा रहा है। इन्हीं प्रक्रियाओं को लेकर अक्सर विवाद की स्थिति बनती है। सरकार की ओर से दाखिल केविएट में बताया गया है कि 15 शेष नगरीय निकायों और दो नए नगर पंचायतों में चुनाव प्रस्तावित हैं। इनके लिए परिसीमन और आरक्षण की प्रक्रिया संबंधित कानूनों के तहत की जा रही है।

क्या है केविएट का मतलब?
केविएट का सीधा मतलब है कि यदि कोई व्यक्ति या पक्ष संबंधित प्रक्रिया को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर करता है और तत्काल स्टे या अन्य अंतरिम राहत मांगता है, तो सरकार को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए।
सरकार का उद्देश्य यह है कि उसकी दलील सुने बिना परिसीमन या आरक्षण की प्रक्रिया पर कोई एकतरफा अंतरिम आदेश जारी न हो।

इन निकायों में चुनाव की तैयारी
प्रस्तावित चुनावों में भिलाई, रिसाली, भिलाई-चरौदा और बीरगांव जैसे प्रमुख नगर निगम शामिल हैं। इसके अलावा जामुल, सारंगढ़, खैरागढ़, बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा समेत कई नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों में भी चुनाव प्रस्तावित हैं।
वहीं तमनार और बड़ी करेली को नए नगर पंचायत के रूप में चुनावी प्रक्रिया में शामिल किए जाने की तैयारी है।

परिसीमन-आरक्षण से बदलते हैं चुनावी समीकरण
निकाय चुनाव में वार्ड की सीमाएं और सीटों का आरक्षण सीधे तौर पर उम्मीदवारों की दावेदारी और राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करता है। ऐसे में इन दोनों प्रक्रियाओं को लेकर आपत्ति या कानूनी चुनौती की संभावना बनी रहती है।
इसी को देखते हुए सरकार ने चुनाव से पहले ही हाईकोर्ट में केविएट दाखिल कर अपना पक्ष सुरक्षित रखने की तैयारी की है। अब यदि परिसीमन या आरक्षण को लेकर कोई याचिका दायर होती है, तो सरकार को सुनवाई का अवसर दिए जाने के बाद ही अंतरिम राहत पर फैसला होने की संभावना रहेगी।
सरकार की इस पहल को निकाय चुनाव की प्रक्रिया में संभावित कानूनी अड़चनों से निपटने की पूर्व तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है।






































