BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आरोपी के पास रिश्वत के लिए इस्तेमाल किए गए नोट मिल जाना अकेले दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह भी साबित करना होगा कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी और उसे स्वीकार किया था। मांग साबित किए बिना केवल रकम की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने 18 सितंबर को सूरजपुर जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय के तत्कालीन लेखापाल की अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की कथित मांग और स्वीकृति को विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए साबित नहीं कर सका।

इसके बाद हाईकोर्ट ने सूरजपुर की विशेष अदालत के मार्च 2017 के दोषसिद्धि वाले फैसले को रद्द करते हुए लेखापाल को आरोपों से बरी कर दिया। अभियोजन के मुताबिक मां सरस्वती शिक्षा समिति द्वारा संचालित एक स्कूल की मान्यता के बदले लेखापाल ने समिति के अध्यक्ष से 15 हजार रुपए रिश्वत की मांग की थी। बाद में कथित तौर पर यह रकम घटाकर 8 हजार रुपए तय हुई। शिकायत के आधार पर एंटी करप्शन ब्यूरो ने 30 जून 2014 को सूरजपुर स्थित DEO कार्यालय में ट्रैप की कार्रवाई की। अभियोजन का दावा था कि आरोपी ने 8 हजार रुपए स्वीकार किए और उसे रंगे हाथ पकड़ा गया। उसके पास से रकम बरामद हुई थी और केमिकल जांच में नोटों को छूने की पुष्टि भी हुई थी।

ट्रायल के दौरान अभियोजन के मामले को बड़ा झटका लगा। खुद शिकायतकर्ता ने अदालत में बयान दिया कि लेखापाल ने उससे कभी रिश्वत की मांग नहीं की थी। एक अन्य गवाह ने भी बताया कि शिकायतकर्ता ने कथित तौर पर जबरन पैसे आरोपी की जेब में डाल दिए थे। हाईकोर्ट ने इन बयानों पर गौर करते हुए कहा कि किसी भी गवाह ने रिश्वत की मांग के मुख्य आरोप का समर्थन नहीं किया। ऐसे में केवल आरोपी की जेब से रकम बरामद होने को रिश्वत की मांग और स्वीकृति का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

मामले में रिश्वत की मांग साबित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के तौर पर ऑडियो रिकॉर्डिंग भी पेश की गई थी। हाईकोर्ट ने इसकी विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी ने स्वीकार किया था कि रिकॉर्डिंग के संबंध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत जरूरी प्रमाणपत्र हासिल नहीं किया गया था। इसके अलावा आरोपी की आवाज का नमूना भी नहीं लिया गया और रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाज की फॉरेंसिक जांच से पुष्टि नहीं कराई गई।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग और स्वीकृति की आवश्यक शर्त को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। केवल कथित रिश्वत की रकम की बरामदगी और उस पर रासायनिक परीक्षण की पुष्टि, जब मांग का विश्वसनीय प्रमाण मौजूद न हो, दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने विशेष अदालत का 2017 का फैसला रद्द कर दिया और लेखापाल को भ्रष्टाचार के आरोपों से बरी कर दिया।





































