RAIPUR NEWS. छत्तीसगढ़ में मातृभाषा के सम्मान को लेकर एक बार फिर आवाज बुलंद हुई है। जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी और छत्तीसगढ़िया क्रान्ति सेना ने भारत सरकार के जनगणना विभाग द्वारा जारी ‘स्व-जनगणना पोर्टल’ में “छत्तीसगढ़ी भाषा” को अनिवार्य रूप से शामिल करने की मांग की है। इस संबंध में संगठनों के प्रतिनिधियों ने रायपुर के जिलाधीश को ज्ञापन सौंपकर जनभावनाओं से अवगत कराया।

संगठनों का कहना है कि प्रदेश के करोड़ों लोगों की मातृभाषा होने के बावजूद यदि जनगणना फॉर्म और पोर्टल में छत्तीसगढ़ी का स्पष्ट विकल्प नहीं होगा, तो राज्य की वास्तविक भाषाई स्थिति सामने नहीं आ पाएगी। उन्होंने इसे छत्तीसगढ़िया अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा मुद्दा बताया।

इतिहास और आंकड़ों का दिया हवाला
ज्ञापन में बताया गया कि छत्तीसगढ़ शासन के राजभाषा आयोग द्वारा 28 नवंबर 2007 को छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिया जा चुका है। साथ ही, छत्तीसगढ़ी व्याकरण की रचना वर्ष 1885 में ही साहित्यकार हीरालाल चन्नाहू द्वारा किए जाने का उल्लेख करते हुए भाषा की समृद्ध परंपरा को रेखांकित किया गया।

संगठनों ने यह भी दावा किया कि छत्तीसगढ़ समेत आसपास के राज्यों में करीब 3.5 करोड़ लोग छत्तीसगढ़ी का उपयोग करते हैं। वर्ष 2020 के भाषाई सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा गया कि प्रदेश की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी छत्तीसगढ़ी बोलती है।
ये हैं प्रमुख मांगें
ज्ञापन में सरकार के समक्ष चार प्रमुख मांगें रखी गई हैं
-जनगणना 2026-27 में छत्तीसगढ़ी भाषा को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
-प्राथमिक शिक्षा में छत्तीसगढ़ी को स्थान दिया जाए।
-शासकीय कार्यों में छत्तीसगढ़ी भाषा का उपयोग सुनिश्चित किया जाए।
-छत्तीसगढ़ी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए पहल की जाए।

भाषाई पहचान का सवाल
संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि जनगणना में छत्तीसगढ़ी को उचित स्थान नहीं मिला, तो यह न केवल आंकड़ों की सटीकता को प्रभावित करेगा, बल्कि राज्य की भाषाई पहचान पर भी असर डालेगा।
इस मुद्दे को लेकर आने वाले दिनों में और व्यापक जनआंदोलन की संभावना भी जताई जा रही है।





































