RESERVATION HATAO MOVEMENT . जब अभिजीत दीपके ने कुछ समय पहले ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) बनाई थी, तो किसने सोचा होगा कि यह शिक्षा के मुद्दे पर भारत की युवा पीढ़ी को एकजुट करेगी और केंद्रीय मंत्री को इस्तीफा देना पड़ेगा, लेकिन सीजेपी को मिली सफलता के बाद अब आनलाइन कई ऐसी ही मुद्दे-आधारित मुहिम शुरू हो गई हैं। इन्ही में से एक ‘रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन’ (आरएचए) जाति-आधारित आरक्षण के खिलाफ इंटरनेट मीडिया पर जोर पकड़ रहा है। हैरानी की बात है कि 48 घंटे में ही इस पेज को 5.5 मिलियन यानी 55 लाखों ने फॉलो किया है।

कैसे हुई आंदोलन की शुरुआत?
जानकारी के मुताबिक, इस अभियान की शुरुआत इंस्टाग्राम पर ‘Reservation Hatao Movement’ नाम के एक पेज से हुई। आयोजकों का कहना है कि यह एक शांतिपूर्ण डिजिटल अभियान है, जिसका उद्देश्य बिना किसी हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था के अपनी बात सरकार और जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाना है।

अभियान से जुड़े लोग युवाओं से अपील कर रहे हैं कि वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और राजनीतिक दलों के आधिकारिक अकाउंट्स के कमेंट सेक्शन में अपनी राय दर्ज कराएं। इसे आयोजक “First Peaceful Online Protest” के रूप में प्रचारित कर रहे हैं।

क्या हैं आंदोलन की प्रमुख मांगें?
अभियान से जुड़े लोगों की ओर से कुछ प्रमुख मांगें सामने रखी गई हैं—
- वर्तमान जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा या समाप्ति की मांग।
- सरकारी नौकरियों, प्रतियोगी परीक्षाओं और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए मेरिट आधारित चयन प्रणाली लागू करने की मांग।
- यदि किसी प्रकार का आरक्षण या विशेष सहायता दी जाए तो उसका आधार आर्थिक स्थिति (EWS) या संसाधनों की कमी को बनाया जाए।
- सभी बच्चों के लिए समान शिक्षा व्यवस्था और प्रतिस्पर्धा के समान अवसर सुनिश्चित किए जाएं।
अभियान का एक प्रमुख नारा भी सोशल मीडिया पर साझा किया जा रहा है—”सारी जातियां एक समान, मेरा बस यह देश महान।”

सोशल मीडिया पर तेजी से बढ़ रही लोकप्रियता
सोशल मीडिया पर यह अभियान तेजी से वायरल हो रहा है। विभिन्न पोस्ट्स और दावों के अनुसार, इंस्टाग्राम पेज से 5 मिलियन लोग जुड़ चुके हैं।
बताया जा रहा है कि अभियान के तहत वेबसाइट भी लॉन्च की गई है, जहां ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन और डिजिटल वॉलंटियर जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की गई है। साथ ही भविष्य में इसे जमीनी स्तर तक ले जाने की भी तैयारी होने की बात कही जा रही है।

विरोध में भी उठ रही हैं आवाजें
इस अभियान के वायरल होने के साथ ही आरक्षण समर्थक वर्ग ने भी सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि भारत में सामाजिक और जातीय असमानता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। ऐसे में सामाजिक न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण व्यवस्था अभी भी जरूरी है।
समर्थकों का तर्क है कि आरक्षण केवल आर्थिक सहायता का माध्यम नहीं बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक असमानताओं को कम करने का संवैधानिक उपाय है।
सरकार के सामने क्या हो सकती हैं चुनौतियां?
यदि यह डिजिटल अभियान लगातार गति पकड़ता है तो सरकार के सामने कई तरह की चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
पहली चुनौती यह होगी कि सोशल मीडिया पर युवाओं की बढ़ती भागीदारी इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बना सकती है। दूसरी ओर यदि यह अभियान ऑनलाइन से आगे बढ़कर धरातल पर पहुंचता है तो कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी प्रशासन के लिए चुनौती बन सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आरक्षण भारत की राजनीति का बेहद संवेदनशील विषय रहा है। ऐसे में इस तरह के किसी भी बड़े डिजिटल अभियान का असर राजनीतिक विमर्श और सामाजिक समीकरणों पर पड़ सकता है।
क्या आगे और बड़ा होगा आंदोलन?
फिलहाल यह अभियान अपने शुरुआती चरण में माना जा रहा है। आने वाले दिनों में यह केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहेगा या बड़े जनआंदोलन का रूप लेगा, इस पर सभी की नजरें बनी हुई हैं। हालांकि इतना स्पष्ट है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब जनमत तैयार करने और बड़े सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनाने में पहले से कहीं अधिक प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।


































