बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि बुजुर्ग माता-पिता अपनी देखभाल और सहारे की उम्मीद पर बेटे या किसी संतान को संपत्ति गिफ्ट करते हैं और वह उस जिम्मेदारी को पूरा नहीं करता, तो ऐसे प्रॉपर्टी ट्रांसफर को रद्द किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि माता-पिता का भरोसा टूटने की स्थिति में गिफ्ट डीड निरस्त करने का कानूनी आधार मौजूद है।

क्या है पूरा मामला?
यह मामला मुंबई के कारोबारी अश्विन रमेश सोनी से जुड़ा है। उन्होंने उस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें लोअर परेल स्थित फ्लैट अपने माता-पिता को वापस सौंपने का निर्देश दिया गया था। रिकॉर्ड के अनुसार, रमेश और बीना सोनी ने मई 2023 में अपनी संपत्ति बेटे के नाम इसलिए ट्रांसफर की थी क्योंकि उसने बुढ़ापे में उनकी देखभाल करने और परिवार में सामंजस्य बनाए रखने का भरोसा दिया था। संपत्ति के ट्रांसफर से जुड़ा स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन का खर्च भी माता-पिता ने ही उठाया था।

परिवार में बढ़े विवाद, माता-पिता को छोड़ना पड़ा घर
कोर्ट के सामने आए तथ्यों के मुताबिक, परिवार में मतभेद बढ़ने के बाद माता-पिता को लोअर परेल स्थित अपना घर छोड़ना पड़ा। वहीं, भायखला में निर्माणाधीन दूसरी संपत्ति भी बेटे के नाम हो चुकी थी, जिसका कब्जा भी उन्हें नहीं मिल पाया। इस कारण वे अपनी दोनों संपत्तियों से वंचित हो गए।

बेटे की दलील और कोर्ट की टिप्पणी
बेटे ने अदालत में कहा कि उसके पिता आर्थिक रूप से सक्षम हैं, उनके पास अन्य संपत्तियां भी हैं और लोअर परेल का फ्लैट उसके पैसों से खरीदा गया था। उसने यह भी दलील दी कि फ्लैट वापस करने से उसकी पत्नी और बच्चों पर असर पड़ेगा।

हालांकि, हाई कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि गिफ्ट डीड में माता-पिता की देखभाल की शर्त स्पष्ट रूप से दर्ज थी और वही संपत्ति ट्रांसफर का मुख्य आधार थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता की आर्थिक स्थिति इस मामले में निर्णायक नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि संपत्ति देखभाल की उम्मीद पर दी गई थी और उस वादे का पालन नहीं हुआ। इसी आधार पर अदालत ने बेटे की याचिका खारिज करते हुए फ्लैट का कब्जा माता-पिता को लौटाने का आदेश बरकरार रखा।






































