ALLAHABAD HIGH COURT प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते से जुड़े एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट टिप्पणी की है कि यदि संकट के समय पत्नी की मदद उसके मायके वाले (माता-पिता) करते हैं, तो इससे पति अपने कानूनी दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि पत्नी के माता-पिता की आय को उसकी अपनी आय नहीं माना जा सकता और यह पति द्वारा दिए जाने वाले गुजारा भत्ते का विकल्प नहीं हो सकता।

यह मामला बुलंदशहर की परिवार अदालत के एक फैसले से जुड़ा है, जिसमें पत्नी की गुजारा भत्ता की मांग खारिज कर दी गई थी, जबकि दो नाबालिग बच्चों को 3,000 रुपये प्रति माह भत्ता देने का आदेश दिया गया था। इसके खिलाफ पत्नी और बच्चों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।

मामले में महिला ने आरोप लगाया था कि शादी के बाद से ही पति और ससुराल वाले उसका उत्पीड़न करते रहे और जनवरी 2020 में उसे बच्चों के साथ घर से निकाल दिया गया। महिला का यह भी कहना था कि पति ने उससे संबंध तोड़कर किसी अन्य महिला से शादी कर ली।

वहीं पति ने दलील दी कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के अलग रह रही है और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप, जैसे अवैध संबंध और उत्पीड़न, साबित नहीं होते। उसने यह भी बताया कि सेना में सेवा के दौरान वह पत्नी और बच्चों को हर महीने आर्थिक सहायता देता था और सेवानिवृत्ति के बाद उसे लगभग 21,025 रुपये मासिक पेंशन मिलती है, जो उसकी एकमात्र आय है।

परिवार अदालत ने अपने निर्णय में कहा था कि पत्नी दहेज उत्पीड़न, क्रूरता या दूसरी शादी के आरोपों को साबित करने में असफल रही है, इसलिए वह गुजारा भत्ते की हकदार नहीं है। अदालत ने यह भी माना कि वह बिना पर्याप्त कारण के अलग रह रही है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अवैध संबंधों के आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य, गवाह या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए हैं, इसलिए उन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।





































