DELHI NEWS. दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला के पहनावे को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी लड़की या महिला के कपड़े उसकी व्यक्तिगत पसंद हैं। जिरह के दौरान उसके पहनावे का इस्तेमाल चरित्र पर सवाल उठाने या अपराध का दोष पीड़िता पर डालने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे सवाल पीड़िता को शर्मिंदा करने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का जरिया नहीं बनने चाहिए।

‘महिला क्या पहने, यह तय करने का अधिकार किसी को नहीं’
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि किसी महिला या लड़की को क्या पहनना है, यह उसकी व्यक्तिगत पसंद का मामला है। पड़ोसी, समाज, आरोपी या अदालत में पेश होने वाला वकील यह तय नहीं कर सकता कि किसी महिला को किस तरह के कपड़े पहनने चाहिए। कोर्ट ने उस सोच को भी खारिज किया, जिसमें लड़कियों के कपड़ों को लड़कों के व्यवहार से जोड़कर देखा जाता है। अदालत ने साफ कहा कि किसी महिला के पहनावे को उसके खिलाफ इस्तेमाल करना स्वीकार्य नहीं है।

‘जींस पहनने से लड़के भ्रष्ट होते हैं’ वाली सोच पर सवाल
अदालत ने उस तर्क पर भी सख्त टिप्पणी की, जिसमें जींस पहनने वाली लड़की को लेकर यह धारणा बनाई गई कि इससे युवा लड़के ‘भ्रष्ट’ हो सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि बच्चों और युवाओं को अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखना, दूसरों की व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान करना और हर व्यक्ति के साथ गरिमा से पेश आना सिखाया जाना चाहिए। लड़कियों के कपड़ों को नियंत्रित करना इसका समाधान नहीं है।

2013 के मामले में आरोपी को ठहराया दोषी
यह मामला जुलाई 2013 का है। आरोप था कि एक पड़ोसी ने 17 वर्षीय लड़की का पीछा किया, उस पर यौन रंग वाली टिप्पणियां कीं और उसके गाल व निजी अंग को छुआ। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2014 में आरोपी को बरी कर दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस फैसले को रद्द करते हुए आरोपी को आईपीसी की धारा 354A(1)(i) के तहत दोषी ठहराया।

जिरह में कपड़ों से जुड़े सवालों पर कोर्ट नाराज
मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने पीड़िता से उसके पश्चिमी कपड़ों, इलाके के लोगों की कथित आपत्ति और डॉक्टर के पास जाते समय उसने क्या पहना था, जैसे सवाल किए थे। हाईकोर्ट ने इन सवालों को मामले के लिए अप्रासंगिक बताया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे सवाल पीड़िता को शर्मिंदा करने, अपमानित करने और उसके चरित्र को लेकर नैतिक फैसला सुनाने की कोशिश जैसे लगते हैं। अदालत ने कहा कि ट्रायल जज को शुरुआत में ही इस तरह की जिरह को रोक देना चाहिए था।

धर्म और परंपरा का हवाला देकर कानून नहीं बदलेगा
अदालत ने मामले में धर्म और स्थानीय परंपरा का हवाला दिए जाने पर भी सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि कानून सभी लोगों पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे व्यक्ति किसी भी धर्म या समुदाय से संबंधित हो। किसी गैरकानूनी कृत्य को सही ठहराने या महिला की व्यक्तिगत पसंद पर पाबंदी लगाने के लिए धर्म या स्थानीय परंपरा का सहारा नहीं लिया जा सकता।
कोर्ट में भी पीड़ित की गरिमा जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि जिरह का अधिकार आरोपी को है, लेकिन इसकी भी एक सीमा है। जब सवाल गवाह को डराने, अपमानित करने या शर्मिंदा करने का जरिया बनने लगें, तो अदालत को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया पीड़ित के लिए एक और मानसिक आघात का कारण नहीं बननी चाहिए। आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की रक्षा जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर पीड़ित की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता।





































