DELHI NEWS.दिल्ली हाईकोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक के एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि कुछ विशेष परिस्थितियों में पति-पत्नी को तलाक के लिए एक साल तक अलग रहने की कानूनी शर्त से छूट दी जा सकती है। मामले में दंपत्ति ने दिसंबर 2025 में आर्य समाज मंदिर में शादी की थी, लेकिन साथ रहने के महज 84 दिन बाद दोनों अलग हो गए। इसके बाद दोनों ने आपसी सहमति से तलाक लेने का फैसला किया।

दंपत्ति के मुताबिक, उनके बीच वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं हुए थे। दोनों ने आपसी तालमेल की कमी और लगातार मतभेदों को शादी जारी रखने में बाधा बताया। मई 2026 में उन्होंने आपसी सहमति से तलाक के लिए याचिका दायर की। हालांकि, तीस हजारी कोर्ट की फैमिली कोर्ट ने शुरुआत में उनकी याचिका खारिज कर दी थी।
फैमिली कोर्ट ने क्यों खारिज की थी तलाक की अर्जी?
फैमिली कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा था कि दंपत्ति ने शारीरिक संबंध स्थापित नहीं होने का पर्याप्त कारण नहीं बताया है। इसके बाद मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा, जहां दंपत्ति ने एक साल की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि से छूट देने की मांग की।

दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेणु भटनागर की पीठ ने परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राहत दी। पीठ ने कहा कि कानून में अलग रहने की अवधि का प्रावधान पति-पत्नी को रिश्ते पर दोबारा विचार करने और सुलह का अवसर देने के उद्देश्य से रखा गया है। लेकिन जहां वैवाहिक संबंध की शुरुआत ही खराब रही हो और दोनों साथ नहीं रहना चाहते हों, वहां केवल कानूनी औपचारिकता के कारण उन्हें लंबे समय तक विवाह के बंधन में रखना उचित नहीं हो सकता।
अदालत ने यह भी माना कि ऐसे मामलों में दोनों पक्षों के भविष्य और उन्हें नई जिंदगी शुरू करने का अवसर देने जैसे पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए।
एक साल से पहले तलाक की अनुमति कब मिल सकती है?
हिंदू विवाह अधिनियम के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका दाखिल करने के लिए सामान्यतः पति-पत्नी का कम से कम एक साल अलग रहना जरूरी होता है। हालांकि, कानून में असाधारण परिस्थितियों में इस अवधि से छूट देने का प्रावधान भी है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने दंपत्ति की परिस्थितियों को देखते हुए एक साल की शर्त में राहत दी और फैमिली कोर्ट को तलाक की याचिका पर आगे कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
दंपत्ति को मिली राहत
हाईकोर्ट के फैसले से दंपत्ति के लिए तलाक की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का रास्ता खुल गया। अदालत की टिप्पणी का मुख्य आधार यह था कि कानून का उद्देश्य केवल कागजों पर विवाह बनाए रखना नहीं, बल्कि संबंधित परिस्थितियों में न्यायसंगत समाधान देना भी है।





































