प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी बेटी को केवल शादीशुदा होने के आधार पर नौकरी पाने के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। संबंधित विभाग को शैक्षिक योग्यता, परिवार की आर्थिक स्थिति, आश्रित होने और पद की उपलब्धता समेत सभी निर्धारित शर्तों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना होगा।
न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की पीठ ने सहारनपुर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के 14 नवंबर 2024 के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने याची मनीषा त्यागी के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है। विभाग को आठ सप्ताह के भीतर कारणों सहित नया आदेश पारित करना होगा।
पिता की मृत्यु के बाद मांगी थी अनुकंपा नियुक्ति
मामले के अनुसार, मनीषा त्यागी के पिता धर्मवीर सिंह प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत थे। 14 मई 2015 को सेवाकाल के दौरान उनका निधन हो गया था। इसके बाद मनीषा ने 17 मई 2016 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। उनके दावे पर विभाग को अब हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार दोबारा विचार करना होगा।
फैमिली पेंशन का अधिकार सेवा नियमों से होगा तय
एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मृत सरकारी कर्मचारी की फैमिली पेंशन और अन्य सेवा लाभों का पात्र कौन होगा, यह संबंधित सेवा नियमों के आधार पर तय किया जाएगा, न कि केवल उत्तराधिकार कानून के आधार पर। अदालत ने कहा कि उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करने वाली अदालत इन सेवा लाभों पर अंतिम अधिकार तय नहीं कर सकती।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार-दशम ने इस टिप्पणी के साथ शशि की अपील स्वीकार कर सक्षम प्राधिकारी को मामले में नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया।कांस्टेबल के सेवा लाभों को लेकर था विवाद
यह मामला उत्तर प्रदेश पुलिस के दिवंगत कांस्टेबल सुशील कुमार के सेवा लाभों से संबंधित है। शशि ने विभाग में जमा 2,64,521 रुपये में आधे हिस्से के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र मांगा था। इस रकम में पेंशन, ग्रेच्युटी, समूह बीमा और अन्य सेवा लाभ शामिल थे।
शशि ने खुद को सुशील कुमार की पत्नी बताया था, जबकि दूसरे पक्ष की ओर से देव सहगल को उनका बेटा बताया गया। सत्र न्यायालय ने शशि को पत्नी और देव को बेटा मानते हुए नाबालिग देव को फैमिली पेंशन देने तथा अन्य सेवा लाभों में तीन पक्षों का हिस्सा निर्धारित किया था।
कानूनी वारिस होना और पेंशन का पात्र होना अलग
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का कानूनी वारिस होना और किसी विशेष सरकारी सेवा लाभ का पात्र होना दो अलग-अलग बातें हैं। फैमिली पेंशन और अन्य लाभों के बंटवारे का फैसला संबंधित सेवा नियमों के अनुसार ही किया जाना चाहिए। इस मामले में सक्षम प्राधिकारी को इन्हीं नियमों के आधार पर नए सिरे से निर्णय लेना होगा।


































