RAIPUR NEWS. राजधानी रायपुर का होटल बेबीलॉन कैपिटल रविवार को एक ऐसे आयोजन का साक्षी बना, जहाँ शब्दों में न्याय की दिशा और भविष्य दोनों झलक रहे थे। मंच पर मौजूद थे भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, और अवसर था छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी की ई-स्मारिका के डिजिटल विमोचन का एक ऐसा दस्तावेज, जो न्यायिक प्रशिक्षण की दो दशक लंबी यात्रा को संजोए हुए है।

इस समारोह का आयोजन छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा किया गया, जिसने इसे केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संवैधानिक संवाद का मंच बना दिया। अपने उद्बोधन में मुख्य न्यायाधीश ने छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पहचान छत्तीस किलों की भूमि का उल्लेख करते हुए एक रोचक और गहन प्रतीक प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा जैसे प्राचीन किले केवल रक्षा संरचनाएँ नहीं थे, बल्कि शासन और सामुदायिक जीवन के केंद्र थे, वैसे ही संवैधानिक न्यायालय लोकतंत्र के आधुनिक किले हैं जो सीमाओं की नहीं, अधिकारों की रक्षा करते हैं। यह तुलना सभागार में उपस्थित न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र रही।

न्यायालय समाज से अलग नहीं
मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायालय स्वयं को समाज से पृथक नहीं रख सकते। उन्होंने दंतेवाड़ा, बस्तर और सरगुजा जैसे दूरस्थ अंचलों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्याय की पहुँच भौगोलिक दूरी से सीमित नहीं होनी चाहिए। न्याय हर नागरिक तक पहुँचे—चाहे वह किसी भी कोने में रहता हो, यह संदेश पूरे समारोह का मूल स्वर बन गया।

युवा उच्च न्यायालय, मजबूत पहचान
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय देश के अपेक्षाकृत युवा उच्च न्यायालयों में से एक है, लेकिन उसने कम समय में अपने उच्च मानदंड और सशक्त परंपराएँ स्थापित की हैं। संस्थागत विस्तार को उन्होंने संवैधानिक परिवार के भीतर भाईचारे की भावना का प्रतीक बताया।

इस अवसर पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की उपस्थिति ने समारोह को और गरिमामय बना दिया।
समारोह का समापन न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।



































