आधार-वोटर आईडी लिंक विधेयक से मतदान प्रक्रिया होगी आसान, फर्जी वोटिंग पर लगेगी लगाम

केंद्र सरकार की तरफ से यह विधेयक ऐसे समय में पेश किया जा रहा है, जब उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर के विधानसभा चुनावों में छह महीने से भी कम का समय बचा है। केंद्र सरकार ने सोमवार को चुनाव सुधार से जुड़ा अहम विधेयक लोकसभा में पास करा लिया है।

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सोमवार को चुनाव सुधार से सम्बन्धित एक बिल संसद में पेश किया जिसे पास भी कर दिया गया। इस बिल के बाद वोटर आईडी को आधार कार्ड से जोड़ा जायेगा। माना जा रहा है कि इससे मतदान की प्रक्रिया आसान होगी। वहीं फर्जी वोट पर पूरी तरह से लगाम लग जाएगा।

केंद्र सरकार की तरफ से यह विधेयक ऐसे समय में पेश किया जा रहा है, जब उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर के विधानसभा चुनावों में छह महीने से भी कम का समय बचा है। केंद्र सरकार ने सोमवार को चुनाव सुधार से जुड़ा अहम विधेयक लोकसभा में पास करा लिया है।

बता दें कि ‘चुनाव अधिनियम संशोधन विधेयक सुधार से संबंधित प्रस्ताव चुनाव आयोग (इलेक्शन कमीशन) ने कानून मंत्रालय को दिया था। किरन रिजिजू के मार्गदर्शन वाले कानून मंत्रालय ने इसे मंजूरी देने के बाद विधेयक के रूप में पेश करने का निर्णय लिया। इस प्रस्ताव के तहत चुनाव आयोग ने मतदाताओं के वोटर आईडी कार्ड्स को उनके आधार कार्ड से जोड़ने की योजना सामने रखी। इसके अलावा 18 साल से ऊपर के लोगों को खुद को वोटर के तौर पर जोड़ने के लिए एक ही साल में कई मौके देने का भी प्रावधान रखा गया है।

विशेषज्ञों के अपने तर्क
इधर वोटर आईडी कार्ड को आधार कार्ड से जोड़े जाने के फैसले को कई विशेषज्ञों ने मतदाताओं के लिए नुकसान का संकेत दिया है। ऐसे में इस विधेयक पर केंद्र सरकार की ओर से चुनाव सुरक्षा के क्या तर्क दिए जा रहे हैं और विपक्ष ने इसे मतदाताओं की निजता के हनन से क्यों जोड़ा है इस पर विशेषज्ञों के अपने तर्क हैं।

चुनाव आयोग ने दिया था प्रस्ताव
संसद से जुड़े जानकारों के अनुसार पिछले वर्ष मार्च में केंद्रीय कानून मंत्रालय की तरफ से संसद को बताया गया था कि चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को आधार नंबर के साथ जोड़ने का प्रस्ताव दिया है। इससे एक ही व्यक्ति, अलग-अलग स्थानों पर वोटर लिस्ट में अपना नाम नहीं जुड़वा सकेंगे, जिससे चुनाव में फर्जीवाड़ा और डुप्लिकेशन होने के मौके सीमित हो जाएंगे। इसके लिए लोक प्रतिनिधित्व कानून, 1951 और आधार एक्ट, 2016 दोनों में ही बदलाव किया जाएगा। कहा था यह फैसला अनिवार्य नहीं बल्कि वैकल्पिक होगा।

वोटर आईडी को आधार से जोड़े जाने पर विवाद क्या हैं?
चुनाव विशेषज्ञों और स्वतंत्र थिंक टैंक्स के मुताबिक इस प्रक्रिया से लाभ के साथ नुकसान भी मना है। बता दें कि सरकार की ओर से दिए प्रस्ताव में अब तक यह साफ नहीं है कि वोटर आईडी के डेटाबेस और आधार के डेटाबेस के बीच कितना डेटा साझा किया जाएगा। इसके तरीके क्या होंगे।

मामले में विशेषज्ञ किन शंकाओं पर आगाह कर रहे हैं..
अभी मतदाताओं का चुनावी डेटा चुनाव आयोग के डेटाबेस में सुरक्षित रहता है। इसके सत्यापन के अपने तरीके हैं और यह सरकार के दूसरे डेटाबेस से बिल्कुल अलग है। तो चुनाव आयोग और आधार के डेटाबेस एक-दूसरे के लिए आसानी से मुहैया होंगे।

आशंका है कि इस तरह की जानकारी अलग-अलग डेटाबेस में होने से इसके गलत इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। खासकर एक डेटा सुरक्षा कानून के अभाव में यह निजता के हनन से जुड़ा मामला भी बन सकता है।

विशेषज्ञों ने संभावना जताई है कि आधार और वोटर आईडी के बीच साझा डेटा का इस्तेमाल कुछ लक्षित मतदाताओं की जानकारी हासिल करने में भी किया जा सकता है। यह काम खुद सरकार, उसकी एजेंसियां या हैकर्स की ओर से किया जा सकता है।

आधार और वोटर आईडी को सरकार की ओर से जोड़ने की एक सबसे बड़ी वजह यह है भी है कि वह देश के सभी प्रवासी कामगारों को मतदान प्रक्रिया से जोड़े रखना चाहती है। ताकि वे अपने अपडेटेड आधार कार्ड के जरिए रोजगार वाली जगह से भी वोटिंग में हिस्सा ले सकें।

विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाताओं की जानकारी और आधार कार्ड के डेटाबेस की लिंकिंग से धोखेबाजी की संभावना भी बढ़ सकती है। दरअसल, आधार कार्ड के देशभर में इस्तेमाल होने की वजह से मौजूदा समय में यही पहचान पत्र हर तरह के सत्यापन में इस्तेमाल किया जाता है।

ये बात आई सामने
मामले में विशेषज्ञों की आशंका व तथ्यों को लेकर आईडीएफसी इंस्टीट्यूट के सीनियर एनालिस्ट विभव मारीवाला और स्वतंत्र विश्लेषक प्रखर मिश्र ने कुछ उदाहरण भी पेश किए गए हैं। कहा कि 2020 में ही यूआईडीएआई ने माना था कि उसने करीब 40 हजार फेक आधार कार्ड रद्द किए हैं। यूआईडीएआई ने अपने सिस्टम में धोखेबाजी होने की बात कबूली थी।

ऐसा भी कियाय जा सकता है
वहीं आधार कार्ड की जानकारी के जरिए लक्षित निगरानी के मामले भी सामने आए। आईडीएफसी के मुताबिक आंध्र प्रदेश में जाति और धर्म के मानदंडों का इस्तेमाल कर राज्य सरकार के संचालित एक वेबसाइट पर लगभग 51.67 लाख परिवारों की लोकेशन को मनचाहे तरीके से ट्रैक किया जा सकता है।

इतना ही नहीं तेलंगाना में वोटर लिस्ट से फर्जी वोटरों को हटाने की कोशिश के दौरान 22 लाख असल वोटरों के नाम भी लिस्ट से हट गए थे। तब तेलंगाना राज्य चुनाव आयोग ने एक आरटीआई के जवाब में कहा था कि उसने वोटर लिस्ट में सुधार के लिए आधार कार्ड से जुड़े एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया था। इसमें सार्वभौमिक मताधिकार का उल्लंघन हुआ था। जहां तेलंगाना में यह कदम गलती से उठा था।

केंद्र की तरफ से इन बदलावों का है प्रस्ताव?
1. पेश किए गए विधेयक में प्रावधान है कि अब युवा चाहें तो हर साल चार अलग-अलग तिथियों पर मतदाता के रूप में अपना नामांकन करा सकते हैं।

2. इसके अलावा विधेयक में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की भाषा में भी बदलाव का प्रावधान है, ताकि सशस्त्र सेना बल में सेवा दे रही महिला के पति को भी सर्विस वोटर के तौर पर रजिस्टर करने का मौका मिल सके। इसी लिए चुनावी कानून को जेंडर न्यूट्रल बनाने का प्रस्ताव पेश किया गया है।

3. पेश किए गए विधेयक में स्कूलों को मतदान केंद्र के रूप में लेने की आपत्ति खारिज करते हुए चुनाव आयोग को यह अधिकार मिल जाएगा कि वे चुनाव संचालन के लिए किसी भी परिसर को चुनावों तक ले सकते हैं।

(TNS)