नुकसानः आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट जाना भारी पड़ा, अब देना होगा 1.52 करोड़ का मुआवजा

विभाग के कार्यपालन यंत्री ने मुआवजा न देकर फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर दी थी, लेकिन हाइकोर्ट ने जिला न्यायालय के फैसले को यथावत रखा। इसके साथ ही अब कोर्ट ने याचिकाकर्ता को 39 लाख की जगह लगभग डेढ़ करोड़ की क्षतिपूर्ति देने का फैसला दिया है।

कोरिया (Korea)। विभागीय अधिकारी की अनदेखी और मुआवजे के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट (High Court) जाना राज्य शासन को भारी पड़ गया है। एक अधिकारी की गलती की वजह से याचिकाकर्ता (petitioner) को 39 लाख की बजाय 1.10 करोड़ रुपए का मुआवजा (Compensation) देना पड़ेगा।

मामले के अनुसार 2005 में न्यायालय (Court) ने पीडब्लूडी को अप्रोच रोड के मुआवजे के एवज में लगभग 38 लाख 78 हजार रुपए याचिकर्ता को देने का फैसला सुनाया था। पर विभाग के कार्यपालन यंत्री (executive engineer) ने मुआवजा न देकर फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर दी थी, लेकिन हाइकोर्ट ने जिला न्यायालय के फैसले को यथावत रखा। इसके साथ ही अब कोर्ट ने याचिकाकर्ता को 39 लाख की जगह लगभग डेढ़ करोड़ की क्षतिपूर्ति देने का फैसला दिया है।

कार्यपालन यंत्री की हठधर्मिता रहा कारण

मामले में ये बात सामने आई कि पीडब्ल्यूडी के कार्यपालन यंत्री की हठधर्मिता के कारण राज्य सरकार को 1 करोड़ 10 लाख का नुकसान हुआ है। 39 लाख रुपए की जमीन मुआवजा के मामले में अब लोक निर्माण विभाग को याचिकाकर्ता को 1 करोड़ 52 लाख रुपए देना होगा। इसके चलते कोर्ट ने पीडब्लूडी का खाता भी सीज करवा दिया है।

विभाग का बैक खाता सीज

प्रथम जिला एवं सत्र न्यायालय मनेंद्रगढ़ ने भूमि अधिग्रहण की सुनवाई कर आदेश पारित किया है। इसमें नियम के तहत जमीन क्षतिपूर्ति के रूप में 39 लाख रुपए के भुगतान के अलावा एक करोड़ 10 लाख रुपए देना होगा। इसके साथ ही अदालत ने विभाग के भारतीय स्टेट बैंक खाते को सीज कर दिया है। मंगलवार को बैंक प्रबंधन को पत्र लिखकर खाते की संग्रह राशि की जानकारी भी मांगी गई है।

कार्यपालन यंत्री को बताया जिम्मेदार
प्रकरण की जानकारी देते हुए याचिकाकर्ता और वरिष्ठ वकील रमेश सिंह ने विभाग के कार्यपालन यंत्री की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि रेलवे ओवरब्रिज के लिए अप्रोच रोड बनाने के लिए उनकी जमीन 1988 में अधिग्रहित की गई थी। उसके बाद से यह मामला विभिन्न न्यायालयों में विचाराधीन रहा है। अपर जिला न्यायाधीश ने मुआवजा के लिए आदेश पारित किया था, जिसके विरुद्ध कार्यपालन यंत्री हाईकोर्ट चले गए थे।
(TNS)