BASTAR DUSSEHRA.राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आज बस्तर के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में शामिल हुईं। उन्होंने मां दंतेश्वरी मंदिर में पूजा-अर्चना कर देश की सुख-समृद्धि की कामना की। इसके बाद राष्ट्रपति पैदल सिरहासार भवन पहुंचीं, जहां आदिवासी समाज के पारंपरिक आयोजन मुरिया दरबार में उनका स्वागत लोकनृत्य और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ किया गया।

मां दंतेश्वरी के दर्शन के बाद मुरिया दरबार पहुंचीं राष्ट्रपति
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जगदलपुर एयरपोर्ट से सीधे मां दंतेश्वरी मंदिर पहुंचीं। यहां उन्होंने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इसके बाद वे पैदल सिरहासार भवन पहुंचीं और बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण परंपरा मुरिया दरबार में हिस्सा लिया। इस दौरान आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिली।

मुरिया दरबार को बड़ा बनाने की उठी मांग
कार्यक्रम में बस्तर के अलग-अलग क्षेत्रों से आए मांझी, चालकी, मेंबर, मेंबरिन, मुखिया और समाज के प्रतिनिधियों ने अपनी बातें रखीं। इस दौरान मुरिया दरबार का विस्तार करने की मांग भी उठाई गई, ताकि भविष्य में अधिक से अधिक लोग इस ऐतिहासिक आयोजन में शामिल हो सकें।

राष्ट्रपति ने समाज के प्रमुखों से मुरिया दरबार के इतिहास और परंपराओं के बारे में जानकारी ली।
‘समय के साथ कानून बदले, लेकिन आदिवासी परंपराएं कायम रहीं’
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि बस्तर आकर उन्हें यहां की समृद्ध संस्कृति को करीब से जानने का अवसर मिला है। उन्होंने अपने आदिवासी समाज से जुड़ाव का उल्लेख करते हुए बताया कि उनके परिवार में भी उनके दादा, पिता और भाई मांझी रहे हैं।
उन्होंने कहा कि पहले राजाओं का शासन था, फिर अंग्रेज आए और आज देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। समय के साथ नियम-कानून बदलते रहे, लेकिन आदिवासी समाज ने अपनी पारंपरिक व्यवस्थाओं और रीति-रिवाजों को बनाए रखा है।
‘छोटे विवादों के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर न लगाएं’
राष्ट्रपति ने कहा कि पहले गांवों में जमीन से जुड़े विवाद या आपसी झगड़े होने पर लोग मांझी-चालकी के पास जाकर अपनी समस्याएं रखते थे। स्थानीय स्तर पर विवाद सुलझाने की यह परंपरा समाज की एकजुटता का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
उन्होंने कहा कि अब कई मामलों में लोगों को थाने और अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जहां न्याय मिलने में लंबा समय लग सकता है। राष्ट्रपति ने समाज के प्रमुखों से मुरिया दरबार जैसी पारंपरिक व्यवस्थाओं को जीवित रखने का अनुरोध किया। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आदिवासी समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत, आपसी सहयोग और परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाए।



































