BILASPUR NEWS. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि संघ केवल हिंदुओं के भले के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र के भले के लिए काम करता है। छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान बिलासपुर के कोनी स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में विजयादशमी उत्सव के अवसर पर स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि 1925 में संघ की स्थापना के समय पहले उपेक्षा हुई, फिर विरोध का सामना करना पड़ा और अब संघ की जय-जयकार हो रही है। ऐसे समय में जब संघ के पक्ष में माहौल है, स्वयंसेवकों को पहले से अधिक सतर्कता के साथ काम करना चाहिए। करीब एक घंटे चले उद्बोधन में लगभग 450 स्वयंसेवक मौजूद रहे। डॉ. भागवत ने शताब्दी वर्ष के दौरान किए गए कार्यों को आगे भी जारी रखने पर जोर दिया। उन्होंने स्वयंसेवकों को लक्ष्य दिया कि वे पहले किसी अपरिचित व्यक्ति को परिचित बनाएं, फिर उससे मित्रता करें और इसके बाद उसे संघ से जोड़ने का प्रयास करें।

बैठक में रायपुर के कार्यकर्ताओं ने रात्रि शाखा के एक प्रयोग की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पावभाजी बेचने वालों को जोड़कर रात्रि शाखा शुरू की गई। वहीं, मस्तूरी मंडल की एक शाखा के 10 स्वयंसेवकों ने 10 अलग-अलग स्थानों पर नई शाखाएं शुरू करने की जानकारी दी। इस पर डॉ. भागवत ने पूछा कि क्या नई शाखाएं शुरू करने के कारण मूल शाखा बंद तो नहीं हो गई? स्वयंसेवकों ने बताया कि उन्होंने स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित किया है और मूल शाखा के साथ सभी 10 नई शाखाएं भी संचालित हो रही हैं।

डॉ. भागवत ने कहा कि शताब्दी वर्ष में किए गए कार्यक्रमों को भूलना नहीं है, बल्कि उनके अनुभवों के आधार पर संपर्क और शाखा विस्तार का काम जारी रखना है। उन्होंने संघ के कार्य में शाखा, कुटुंब और अपनत्व के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि इन बिंदुओं को निरंतर परिश्रम से आगे बढ़ाना होगा। संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि आरएसएस के आनुषांगिक संगठन स्वतंत्र और स्वावलंबी हैं। जब उन्हें विचारों और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, तब संघ उनकी सहायता करता है। अपने संबोधन में डॉ. भागवत ने संघ की ताकत को स्वयंसेवकों से जोड़ते हुए कहा कि जिस तरह हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन के एक परमाणु के मिलने से पानी बनता है, उसी तरह स्वयंसेवकों से संघ बनता है। स्वयंसेवकों के बिना संघ की ताकत नहीं है।

विरोध और आलोचना के बीच सतर्क रहने का संदेश
डॉ. भागवत के संबोधन में संघ को लेकर हो रही आलोचनाओं और विरोध के बीच स्वयंसेवकों की जिम्मेदारी पर भी जोर रहा। उन्होंने स्वयंसेवकों से राष्ट्रहित में काम करते समय सतर्क रहने का आह्वान किया, ताकि किसी व्यक्ति की गलती से पूरे संगठन की छवि प्रभावित न हो। उन्होंने संघ की स्थापना के शुरुआती दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि अंग्रेजों ने संघ को देशभक्त बनाने वाली संस्था के रूप में देखा था। उनके अनुसार, उस समय सरकारी कर्मचारियों और उनके बच्चों के शाखाओं में जाने पर प्रतिबंध लगाया गया था, जिसे बाद में विरोध के बाद हटाना पड़ा।

एक साल में 2,311 नई शाखाएं, संख्या बढ़कर 5,500 हुई
बौद्धिक सत्र से पहले डॉ. भागवत ने विभाग और खंड स्तर के प्रमुखों के साथ शताब्दी वर्ष में किए गए कार्यों की समीक्षा की। इस दौरान उन्हें बताया गया कि पिछले एक साल में 2,311 स्थानों पर नई शाखाएं शुरू की गई हैं। इससे शाखाओं की कुल संख्या बढ़कर 5,500 हो गई है। कार्यक्रम में क्षेत्र संघचालक डॉ. पूर्णेंदु सक्सेना, प्रांत संघचालक टोपलाल वर्मा, विधायक अमर अग्रवाल, धरमलाल कौशिक और सुशांत शुक्ला सहित अन्य लोग मौजूद थे।
आज दो सत्रों में बैठकें, अगले साल की रणनीति पर चर्चा
23 अक्टूबर को संघ की दो सत्रों में बैठकें प्रस्तावित हैं। इनमें आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा और अगले वर्ष की रणनीति पर चर्चा होगी। विभिन्न विभागों की टोलियां अपने-अपने स्तर पर कार्ययोजना तैयार करेंगी। बैठकों में युवा वर्ग को संघ से जोड़ने के लिए किए जाने वाले प्रयासों पर भी विचार किया जाएगा। इसके साथ ही आरएसएस और भाजपा के खिलाफ बनाए जा रहे नैरेटिव से निपटने की रणनीति पर चर्चा होने की बात कही गई है।



































